खुद को ही अपने मे तलाशेंगे किसी रोज
कायनात को भुलाकर देखेंगे किसी रोज
जहन में अल्फाजो ने बगावत कर रखी है
लम्हे चुरा वक्त से कुछ लिखेंगे किसी रोज
नाराज यू्ँ न हो तु ऐ दिल हर एक बात पर
फुर्सत मिली तो सोचेंगे तुझको किसी रोज
रिश्ते, उम्मीदें, ख्वाब, ताल्लुकात, तमन्नाएँ
जान ले ही लेते हैं ये सहारे भी किसी रोज
हमपे जो गुजरी है शायद सभी पे है गुजरी
हर फसाना लगे हैं कही सुना है किसी रोज
छोटा बच्चा भी गरीबी से वाकिफ़ हो गया
अंगूठा चुसता है भुख लगे जो किसी रोज
मुफलिसी जानती है घर में बिछौना कम है
पलको बिठाती मेहमां जो आते किसी रोज
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