सदियों तक किसकी अदायत कौन करता है
इतनी शिद्दत से आज मुहब्बत कौन करता है
सुब्ह की सुरत धुंधला जाती शाम आते-आते
अपने इश्क की ऐसी हिफाजत कौन करता है
कोई भी आता नही है दैरो हरम के आस्ताने
अब यहां सजदा औ इबादत कौन करता है
मुझको अपने घर बुला खुद घुमती है बेखबर
ऐ जिंदगी भला ऐसी हिकारत कौन करता है
बेसब्री से बादलों का रस्ता देख रहा है सुरज
तपती धूप में उसकी सोहबत कौन करता है
पिसता है ख्वाहिशों औ जरुरतों के दरमियां
उस आम इंसा जैसी हिमाकत कौन करता है
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