Thursday, 18 April 2019

मिजाजे यार ने हैरत में डाल रख्खा है

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मिजाजे   यार  ने  हैरत  में   डाल  रखा है
रकीबो  से   ये  जो  रिश्ता  कमाल रखा है

सुब्ह से शाम तलक ख्वाहिशों को पाला है
ए ज़िन्दगी   तुझे    ऐसे    संभाल  रखा  है

देखा है वक्त ने मुझको  यूं चलते चलते ही
उम्मीद  सा   न दिखा   तो  मलाल रखा है

खयाल  ख्वाब से  आ  या  दरीचे दरवाजे
तेरे   लिए   कई   रस्ता    निकाल  रखा है

जरुरतों   ने   किया  है   हमें   हैरां  इतना
तमाम  ख्वाहिशें  कल पर  ही टाल रखा है

मेयार  भी  न  गिरा  मुल्क  का   यूं चौराहे
यतीम  क्यूँ  है   रिआया    सवाल  रखा है

ये इत्मिनान  खुशी  नींद   हैं सभी मुश्किल
नसीब  कैसे   हो  हैरत   में   डाल  रखा है

Wednesday, 17 April 2019

उम्मीद हसरतों में तकाजों में बंट गया

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उम्मीद   हसरतों  में   तकाजों  में  बंट गया
अब  आदमी  ये  रस्म  रिवाजों में  बंट गया

खुशियाँ तलाशता है वो खुशियों को भूल कर
रिश्तों से कट के अब वो  समाजों में बंट गया

कल आदमी सा लग रहा था आज क्या हुआ
जो  मंदिरों   कलीसे   नमाजों   में  बंट गया

घर से  निकलते  वक्त  जरूरत  जहन  में थे
लौटा  जो  शाम  बच्चों के  नालों में बंट गया

आंगन  के   बीचों बीच  में   दीवार   हो   गयी
इक घर था कल जो अब दो मकानों में बंट गया

दिल  खुश  हुआ  उसे भी  परेशान  देख कर
माजी  में   डूब  कर  वो   खयालों  बंट गया

बाजार   सज   रखे   हैं   यहां   रंग  रंग  के
खाली  सी  जेब  टिस ओ मलालों में बंट गया

सारे    सफेद पोश    हुए    बे नकाब   फिर
जब  मुल्क  मसअलों  में  सवालों में बंट गया

मुद्दे   तमाम   खो   गए   नारों   के   शोर में
संसद  का   कूचा  कूचा  दलालों  में बंट गया

कांधे  गरीब  चढ़  के  ये   कुर्सी  जिसे  मिली
सत्ता  में  आ  के  वो  भी अदाओं में बंट गया

मतलब  की  जिन्दगी  में  मिले  मतलबी बशर
मतलब  के  बाद  वो  भी  बहानों  में बंट गया

Tuesday, 16 April 2019

चिल्लर में ही खनकते से जज्बात को देखा

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चिल्लर में ही खनकते से जज्बात को देखा
फिर  आज  वो  दबे हुए  हालात को देखा

जगमग से शहर के ही  उजालों के दरमियां
नन्हे से इक दिए की भी  औकात को देखा

सारी चमक धमक वहीं  फिकी सी पड़ गई
कूड़े  जो  बिनते  हुए   नवजात  को देखा

माथे  पे  बल  पड़े  हैं  जिसे  देख सुनकर
कुछ  ऐसे  चुभते  हुए  सवालात  को देखा

रखते   अदावतें   हैं    जमाने   के  सामने
छिप छिप के उनमें होती मुलाकात को देखा

दहलीज़  लांघ  पाए  हया  की न जो कभी
वो  दायरों  में  लफ्ज़ ए मोहताज को देखा

हासिल  है  माहिरी  तो  बरसने में  ही इन्हें
बे मौसमों  में  आंख  के  बरसात को देखा

किश्तों  में  मर  रहें  हैं  मगर हौसले बुलंद
वो  जंगे जिंदगी  के  भी लमहात को देखा

Monday, 15 April 2019

वो मिल गया भटकते हमें यूँ ही राह में

वो  मिल  गया  भटकते  हमें  यूँ ही राह में
कल थी गुजारी हमने उमर जिसकी चाह में

हालात  अब  बदल  गए  जज्बात  रह गए
अब  दास्तां  में  हम  न  रहे  ना निगाह में

खामोश  इश्क  को  ही   जगाने  के वास्ते
कर ले  शरीक  हमको  भी अपने गुनाह में

जब से गए वो हमको  तड़पता यूँ छोड़ कर
ठहरा  हुआ  है  वक्त  भी  तब से गवाह में

हर वक्त की  शिकायतें  अच्छी नही जनाब
ऐसी  नही  थी  शर्त  कोई   भी  निबाह में

कदमों को मां के यूँ ही न  जन्नत कहा गया
रहते   तमाम   गर्दिशें    इसकी   पनाह में

झोली  नसीब  की  न   सके  छिनने  कोई
कूवत  कहां  है  ऐसी  सिकंदर में  शाह में

इतना भी मत झुकाओ  कि दस्तार गिर पड़े
पत्थर  पिघलते  देखा है  गुर्बत की आह में

मत तोड़िए भरम मेरा  गिन करके खामियां
खोया  हुआ है  दिल  ये अभी वाह वाह में

Friday, 12 April 2019

मुश्किल को मुश्किल ही बतलाना भूल जाते हैं

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मुश्किल को मुश्किल ही बताना भूल जाते हैं
जब खुद से मिलते हैं  जमाना भूल जाते हैं

उनसे ही पुछते हैं सबब रुठने के उनसे हम
हमको सितमगर  जब सताना भूल जाते हैं

जद्दोजहद में इस कदर उलझी है जिंदगी
रोते तो है आंसू बहाना भूल जाते हैं

उधडे हुए से दिख रहे रिश्ते तमाम ही
पैबंद हर इक पर लगाना भूल जाते हैं

ख्वाहिश को करके दफ्न पुरी की जरूरतें
अब फर्ज ये बच्चे निभाना भूल जाते हैं

हर मोड़ पर मिल जाते हैं अब दर्द भी नये
मिलकर नये से हम पुराना भूल जाते हैं

नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं

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नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं
रिश्तों के दरमियां हूँ पर सबसे जुदा हूँ मैं

ये जिस्मो खाक से कोई खुद को संवार ले
इतना न अपने आप में भी अब बचा हूँ मैं

मत दो जरा उजाले ये खैरात में मुझे
जुगनू से मिट सके न अंधेरा घना हूँ मैं

गुम है शहर से आजकल अम्नो सुकून चैन
आलम ये दहशतों का है सोता कहां हूँ मैं

अंगड़ाई जुल्फ आईना ख्वाबों गुलाब चांद
मुफलिसी से टूटके सब ये भुल गया हूँ मैं

सजदा  इबादतें  ये  जियारत  है  राएगा
उलझी सी जिंदगी है ये उलझा हुआ हूँ मैं

Saturday, 6 April 2019

कि रंजो गम का बदस्तूर सिलसिला रख कर

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कि रंजो गम  का बदस्तूर  सिलसिला रख कर
ये  जिंदगी  है  मिली  हमसे  फासला रख कर

कहीं  दिखी  न   खुलूसे  वफा  की  ही  सूरत
गया है   भूल  कहां  जाने  अब  खुदा रखकर

कुबूल   होती   नही   आस्तानों   में  अब  तो
कि  हमने  देख  लिया  दर पे ही दुआ रखकर

सुना  है  मुल्क  में  बदला है रूख हवाओं का
चलो  तो  देखें  मुंडेरों  पे  इक  दीया  रखकर

तमाम   उम्र  ही   उनकी   दहकते   गुजरी है
चला  जो  करते थे  हाथों में  ही धुंआ रखकर

पलक  झपकते  ही  सब  मालोजर हुए स्वाहा
हुआ न कुछ भी तो हासिल जमा जमा रखकर

परत   उधड़ते  दिखी  है  महज ये  रिश्तों की
मिला  है  क्या  ये  दीवारें सी  दरमियां रखकर

रफीक  सारे    ही  मुंह   फेरने  लगे  अब तो
सभी  को  दूर  किया  तल्ख  सी जुबां रखकर