1212 1122 1212 22
कि रंजो गम का बदस्तूर सिलसिला रख कर
ये जिंदगी है मिली हमसे फासला रख कर
कहीं दिखी न खुलूसे वफा की ही सूरत
गया है भूल कहां जाने अब खुदा रखकर
कुबूल होती नही आस्तानों में अब तो
कि हमने देख लिया दर पे ही दुआ रखकर
सुना है मुल्क में बदला है रूख हवाओं का
चलो तो देखें मुंडेरों पे इक दीया रखकर
तमाम उम्र ही उनकी दहकते गुजरी है
चला जो करते थे हाथों में ही धुंआ रखकर
पलक झपकते ही सब मालोजर हुए स्वाहा
हुआ न कुछ भी तो हासिल जमा जमा रखकर
परत उधड़ते दिखी है महज ये रिश्तों की
मिला है क्या ये दीवारें सी दरमियां रखकर
रफीक सारे ही मुंह फेरने लगे अब तो
सभी को दूर किया तल्ख सी जुबां रखकर
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