Tuesday, 16 April 2019

चिल्लर में ही खनकते से जज्बात को देखा

221 2121 1221 212
चिल्लर में ही खनकते से जज्बात को देखा
फिर  आज  वो  दबे हुए  हालात को देखा

जगमग से शहर के ही  उजालों के दरमियां
नन्हे से इक दिए की भी  औकात को देखा

सारी चमक धमक वहीं  फिकी सी पड़ गई
कूड़े  जो  बिनते  हुए   नवजात  को देखा

माथे  पे  बल  पड़े  हैं  जिसे  देख सुनकर
कुछ  ऐसे  चुभते  हुए  सवालात  को देखा

रखते   अदावतें   हैं    जमाने   के  सामने
छिप छिप के उनमें होती मुलाकात को देखा

दहलीज़  लांघ  पाए  हया  की न जो कभी
वो  दायरों  में  लफ्ज़ ए मोहताज को देखा

हासिल  है  माहिरी  तो  बरसने में  ही इन्हें
बे मौसमों  में  आंख  के  बरसात को देखा

किश्तों  में  मर  रहें  हैं  मगर हौसले बुलंद
वो  जंगे जिंदगी  के  भी लमहात को देखा

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