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उम्मीद हसरतों में तकाजों में बंट गया
अब आदमी ये रस्म रिवाजों में बंट गया
खुशियाँ तलाशता है वो खुशियों को भूल कर
रिश्तों से कट के अब वो समाजों में बंट गया
कल आदमी सा लग रहा था आज क्या हुआ
जो मंदिरों कलीसे नमाजों में बंट गया
घर से निकलते वक्त जरूरत जहन में थे
लौटा जो शाम बच्चों के नालों में बंट गया
आंगन के बीचों बीच में दीवार हो गयी
इक घर था कल जो अब दो मकानों में बंट गया
दिल खुश हुआ उसे भी परेशान देख कर
माजी में डूब कर वो खयालों बंट गया
बाजार सज रखे हैं यहां रंग रंग के
खाली सी जेब टिस ओ मलालों में बंट गया
सारे सफेद पोश हुए बे नकाब फिर
जब मुल्क मसअलों में सवालों में बंट गया
मुद्दे तमाम खो गए नारों के शोर में
संसद का कूचा कूचा दलालों में बंट गया
कांधे गरीब चढ़ के ये कुर्सी जिसे मिली
सत्ता में आ के वो भी अदाओं में बंट गया
मतलब की जिन्दगी में मिले मतलबी बशर
मतलब के बाद वो भी बहानों में बंट गया
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