Monday, 15 April 2019

वो मिल गया भटकते हमें यूँ ही राह में

वो  मिल  गया  भटकते  हमें  यूँ ही राह में
कल थी गुजारी हमने उमर जिसकी चाह में

हालात  अब  बदल  गए  जज्बात  रह गए
अब  दास्तां  में  हम  न  रहे  ना निगाह में

खामोश  इश्क  को  ही   जगाने  के वास्ते
कर ले  शरीक  हमको  भी अपने गुनाह में

जब से गए वो हमको  तड़पता यूँ छोड़ कर
ठहरा  हुआ  है  वक्त  भी  तब से गवाह में

हर वक्त की  शिकायतें  अच्छी नही जनाब
ऐसी  नही  थी  शर्त  कोई   भी  निबाह में

कदमों को मां के यूँ ही न  जन्नत कहा गया
रहते   तमाम   गर्दिशें    इसकी   पनाह में

झोली  नसीब  की  न   सके  छिनने  कोई
कूवत  कहां  है  ऐसी  सिकंदर में  शाह में

इतना भी मत झुकाओ  कि दस्तार गिर पड़े
पत्थर  पिघलते  देखा है  गुर्बत की आह में

मत तोड़िए भरम मेरा  गिन करके खामियां
खोया  हुआ है  दिल  ये अभी वाह वाह में

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