Friday, 12 April 2019

नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं

221 2121 1221 212
नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं
रिश्तों के दरमियां हूँ पर सबसे जुदा हूँ मैं

ये जिस्मो खाक से कोई खुद को संवार ले
इतना न अपने आप में भी अब बचा हूँ मैं

मत दो जरा उजाले ये खैरात में मुझे
जुगनू से मिट सके न अंधेरा घना हूँ मैं

गुम है शहर से आजकल अम्नो सुकून चैन
आलम ये दहशतों का है सोता कहां हूँ मैं

अंगड़ाई जुल्फ आईना ख्वाबों गुलाब चांद
मुफलिसी से टूटके सब ये भुल गया हूँ मैं

सजदा  इबादतें  ये  जियारत  है  राएगा
उलझी सी जिंदगी है ये उलझा हुआ हूँ मैं

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