Mukesh Singhania
Monday, 6 October 2025
दिन भर क्यूँ नही दिखता चांद
Monday, 22 September 2025
आते हैं हमसे मिलने वो चश्मा उतार कर
221 2121 1221 212
आते हैं हमसे मिलने वो चश्मा उतार कर
मिलते नही है पर कभी रुतबा उतार कर
हर पल बदलते देखे हैं हमने जहां के रंग
फिर रख दिया है हमने भी चेहरा उतार कर
अब आजकल ये अहदे मुहब्बत कहां रहे
करते हैं लोग इश्क भी कपड़ा उतार कर
अब हादसों के दौर भी कुछ ऐसे चल पड़े
घर से निकलते लोग हैं सदका उतार कर
नफरत की बाढ़ में ये मुहब्बत भी बह गई
हासिल हुआ क्या अम्न की गंगा उतार कर
मजहब बड़ा के भूख बड़ी है जहान में
इस बार देखते हैं ये चर्चा उतार कर
रंगों के साथ साथ दिली मैल धूल गए
हमने भी रख दिया गिला शिकवा उतार कर
दो चार हर्फ जोड़ लिए बस इधर उधर
फूले नही समाते हैं मिसरा उतार कर
यूँ ही तो वो दरख्त नही लड़खड़ा गया
रोया है खूब जर्द सा पत्ता उतार कर
बचपन को ढुंढता वो फिरे बदहवास सा
लगता उदास तिफ्ल़ का चोला उतार कर
धोखा फरेब झूठ खलक अनलहक़ अना
हम दर पे मां के आए हैं क्या क्या उतार कर
बंटने लगी है राहतें फिर लालीपाप सी
फिर से उचक्के आ गए चोला उतार कर