Friday, 30 November 2018

रंज दिल से बुहार दो साहब शादमानी नुहार दो साहब मशवरे सब संभाल कर रक्खो तल्खतर शय बिसार दो साहब दफ्न कर के गुबार सीने में मौज में ही गुजार दो साहब चार दिन की ये जिंदगानी है ख्वाब जैसी संवार दो साहब चांद अटका है झाड़ियों पर ही हाथ देकर उतार दो साहब है बहुत सर्द सा दिसंबर ये कोई सूरज उतार दो साहब सर्द रातों है बरहना बेबस बस कबा गर्म डार दो साहब आज वादे पे बात ठहरी है मत बहाने हजार दो साहब हिज्र के दिन तवील है बेहद वस्ल की रात वार दो साहब लग रहे आंख में ये बोझल से ख्वाब झूठे उतार दो साहब बात अच्छे दिनों की थी साहब अब ये चाहे उधार दो साहब

रंज  दिल से  बुहार दो साहब
शादमानी   नुहार  दो  साहब

मशवरे सब संभाल कर रक्खो
तल्खतर शय बिसार दो साहब

दफ्न  कर के  गुबार   सीने में
मौज  में  ही  गुजार दो साहब

चार दिन  की  ये  जिंदगानी है
ख्वाब  जैसी  संवार  दो साहब

चांद अटका है  झाड़ियों पर ही
हाथ  देकर   उतार  दो  साहब

है  बहुत  सर्द  सा  दिसंबर  ये
कोई  सूरज   उतार  दो साहब

सर्द  रातों   है   बरहना  बेबस
बस  कबा  गर्म  डार दो साहब

आज  वादे  पे  बात  ठहरी है
मत  बहाने   हजार  दो साहब

हिज्र  के  दिन  तवील है बेहद
वस्ल  की  रात  वार दो साहब

लग रहे  आंख में  ये बोझल से
ख्वाब  झूठे   उतार  दो  साहब

बात  अच्छे दिनों की थी साहब
अब  ये  चाहे  उधार  दो साहब

Sunday, 25 November 2018

वफा की राह में अब खूब पत्थर से निकल आए

वफा की  राह में  अब खूब  पत्थर से निकल आए
छिपा  पहलू में  ही खंजर ये रहबर से निकल आए

शिकायत तो न थी फिर भी न जाने क्या हुआ ऐसा
शरारत  ही शरारत  में  वो क्यूँ घर से निकल आए

जरा सी बात थी लेकिन लगी दिल में ये भीतर तक
जरा  आवाज ऊंची  की  वो भीतर से निकल आए

ठिठुरता   सर्द   रातों  में    बिचारा  बरहना  बेबस
मजारों  के लिए  लेकिन  ये  चादर से निकल आए

जो ही  मजलूम  से  पुछा  कि  रातें सर्द है कितनी
वो  मुट्ठी  भींच  के  दोनों यूं ही घर से निकल आए

पड़ा  है   सर्द   रातों  में   बिचारा  कांपता  सूरज
जरा  सा  धूप दिखलाओ तो ये घर से निकल आए

अम्न  है  मुल्क में  दहशत  की  ये  बातें बेमानी है
सियासत  कह रही  जमहूर को डर से निकल आए

दिया    दैरो हरम    के   आस्तानें   में  जले  ऐसा
जहां में  रोशनी  के  खूब  मंजर  से  निकल  आए

अंधेरों  के  सफर  में  साथ  साया  भी न था अपने
उजालों  में न  जाने  कैसे  लश्कर से  निकल आए

फकत  मुद्दा  सियासत  के लिए  है  राम का मंदिर
भला  फिर  रास्ता  कैसे  कोई  दर से निकल आए

न मांगा  राम ने  मंदिर  न  मौला  चाहे  मस्जिद ही
बेमानी  जिद के  खातिर ही  लश्कर से निकल आए

Saturday, 17 November 2018

ये जिंदगी को समझ ले तू ख्वाब से पहले

ये जिंदगी को समझ ले तू ख्वाब से पहले
लगे  हैं  खूब  हंसी  ये  अजाब  से पहले

उधार की है  खुशी  चार दिन की है सांसे
फकत  ये जान ले तू भी हिसाब से पहले

नजर है आते सभी  साफ साफ दुनिया में
तमाम   खेल   मदारी    सराब  से पहले

बखूब   जान ले   किरदार  कैसे  कैसे हैं
ये आदमी  के  यहां  पर  नकाब से पहले

शहर में ईद का जिम्मा  तो चांद पे ही था
न आए  छत पे  सनम  माहताब से पहले

लगाए  आस थे  हम  खूब जिंदगी से भी
मिले हैं  खार ही  हमको गुलाब से पहले

अदब से पेश  वो आने लगा है अब बेहद
सलाम  खत में लिखा है  जवाब से पहले

जुबां जुबां  पे है किस्सा तमाम उनका ही
शहर में  खूब है  चर्चा  किताब  से पहले

हमें  यकीन था  की  ख्वाब में वो आयेंगे
मगर  ये नींद  न आयी  जनाब  से पहले

उफक में जो ये चमक सा दिखाई देता है
नये सहर की है  दस्तक ये बाब से पहले

मलाल  देख  तू  अपने  तमाम फुर्सत से
वो आदमी था भला कल खराब से पहले

खुशी के दौर में लहजा नही बदलते हम

खुशी के दौर में  लहजा  नही बदलते हम
मिजाज  नर्म  जरा सा  नही  बदलते हम

ख़राशें  वक्त की  पड़ती  जरुर  चेहरे पर
मगर लिहाज का  रुतबा नही बदलते हम

करार  पाने  को  दर दर  भटकते रहते हैं
महज तलाश में  सहसा  नही बदलते हम

सुकून  चैन   मिले   बस  यही  तमन्ना है
इसी  के  वास्ते  इतना  नहीं  बदलते हम

नयी  नसल है  नये  है  जमाने  के मंजर
अदब  लिहाज  सलीका  नही बदलते हम

थकन के बोझ है छाले है पांव में फिर भी
शिकम  के वास्ते  रस्ता  नही बदलते हम

उम्मीद   हसरतें   आंसू   उदास   तन्हाई
मलाल  देख के  रिश्ता  नही  बदलते हम

ए  जिंदगी  तेरे  जलवों से खौफ खाते हैं
मगर  ये  तौर  तरीका  नही  बदलते हम

सिसकते रहते हैं छाले ये पांव के लेकिन
सुकून  वास्ते  रस्ता   नही  बदलते  हम

जुदा है  जात  उसूलों इमां से सबका ही
ये मोजिजा से  अकीदा नही बदलते हम

दिल को ये दिल्लगी नही आती

दिल को ये दिल्लगी नही आती
रोते हैं  तो   हंसी   नही आती

ये  सलीका  मिला है बरसों में
यूं  ही  शाइस्तगी   नही आती

शर्म को कर लिया कोई अगवा
वो नजर अब कभी नही आती

इक खिलौने की रह गई हसरत
लौट  कर  जिंदगी  नही आती

घिर  गई  है   इमारतों  में  वो
हम तलक  धूप ही  नही आती

आरजू     हसरतें      तमन्नाएं
आंख से  बह गयी  नही आती

आईना  चांद  जुल्फ   अंगड़ाई
भूख   के  रहबरी  नही  आती

सलवटें  जिंदगी   की  कैसी है
इस्तरी  से   सही    नही आती

वो चरागां किया  शहर फिर भी
मेरे  घर   रोशनी   नही  आती

दर्द   को    घूंट  घूंट   पीते  हैं
ऐसे  ही   शायरी   नही  आती

हादसों को धता बता दूँ क्या


हादसों   को   धता    बता दूँ क्या
जिंदगी   को    जरा  सजा दूँ क्या

करके   नाकाम   साजिशें  उसकी
मै भी  हंसकर  जरा दिखा दूँ क्या

मुश्किलें    ताक    पे  ही  बैठी है
हौसला   मै    उसे  दिखा  दूँ क्या

ख्वाहिशों   के    यतीम  किस्से में
दर्द   अपना   कहीं   छिपा दूँ क्या

क्यूँ  रही  है   खुशी  बेघर  अक्सर
अब  ये  सारे   शहर   बता दूँ क्या

कुछ  तो  औकात का पता भी चले
आंख  में  ख्वाब  सा  सजा दूँ क्या

कुछ तो अहसासे मुफलिसी हो कम
दो घड़ी  खुद को  ही  भुला दूँ क्या

तिरगी   है   शहर    में  फैली  सी
तोड़ कर  शम्स   ही  मै ला दूँ क्या

तजकिरा   है   मेरी   ये  चुप्पी का
खोल कर  दिल  सभी सुना दूँ क्या

आजमाना  है   सारे    रिश्तों   को
सबको  हालात   मै   बता  दूँ क्या

लोग   खंजर    लिए   है  हाथों में
राह  में   फूल   मै   बिछा  दूँ क्या

Monday, 12 November 2018

हसरतें सीने में अरमान छिपा रक्खी हैं


हसरतें  सीने में  अरमान  छिपा  रक्खी हैं
शोर  भी  खूब  जरूरत  ने मचा रक्खी है

कौन सी शय है जरूरी और नाहक क्या है
बस यही जद्दोजहद  मन में बिठा रक्खी है

हर तकाजे का रखा ध्यान है हरदम घर के
हमने  औकात ये  पैबंद में छिपा रक्खी हैं

साजिशें वक्त ने कुछ यूँ भी चली है अक्सर
वो खिलाफत में  हवाओं को लगा रक्खी है

तारिकी  बाद  सहर रुक ही नहीं सकता है
राएगा  शब ये  यहां  सबको डरा रक्खी है

उम्र भर जीस्त में  कायम ही रही मुश्किलें
बस जरा  होंठ पे  मुस्कान  बचा रक्खी है

मां ने  हर रब्त  सहेजा  है  बड़ी शिद्दत से
मां ने रिश्तों  की महक खूब बचा रक्खी है

उसके कदमों पे  जमाने की बला रक्खी है
मां के होठों पे तो हरदम ही दुआ रक्खी है

ये जिंदगी को समझ ले तू ख्वाब से पहले

ये जिंदगी को समझ ले तू ख्वाब से पहले
लगे  हैं  खूब  हंसी  ये  अजाब  से पहले

उधार की है  खुशी  चार दिन की है सांसे
फकत  ये जान ले तू भी हिसाब से पहले

नजर है आते सभी  साफ साफ दुनिया में
तमाम   खेल   मदारी    सराब  से पहले

बखूब   जान ले   किरदार  कैसे  कैसे हैं
ये आदमी  के  यहां  पर  नकाब से पहले

शहर में ईद का जिम्मा  तो चांद पे ही था
वो छत पे  रात  दिखा  माहताब से पहले

लगाए  आस थे  हम  खूब जिंदगी से भी
मिले हैं  खार ही  हमको गुलाब से पहले

अदब से पेश  वो आने लगा है अब बेहद
सलाम  खत में लिखा है  जवाब से पहले

जुबां जुबां  पे है किस्सा तमाम उनका ही
शहर में  खूब है  चर्चा  किताब  से पहले

हमें  यकीन था  की  ख्वाब में वो आयेंगे
मगर  ये नींद  न आयी  जनाब  से पहले

उफक में जो ये चमक सा दिखाई देता है
नये सहर की है  दस्तक ये बाब से पहले

मलाल  देख  तू  अपने  तमाम फुर्सत से
वो आदमी था भला कल खराब से पहले

Tuesday, 6 November 2018

दौर गुजरा है ये भी और हिसारों की तरह

दौर  गुजरा है  ये भी  और हिसारों की तरह
है  सुलगते  से  रहे  ख्वाब  शरारों की तरह

रोशनी  में  है   नहाया   ये  शहर  लगता है
क्यूँ  अंधेरा सा  है  बस्ती में गुबारों की तरह

हर तरफ  मुल्क में  जलसा है  हंसी मंजर है
झोपड़ी  आज भी  लगती है मजारों की तरह

पेट  की  आग  में  पकते  हैं  दिये  माटी के
ये  सबब  ही है  जरा मंहगे  हजारों की तरह

काश  वो  हमसे  कभी ये भी तो पुछे आकर
क्यूँ चले आते हो तुम ख्वाब में यारों की तरह

है  जियादा  ही   उमर  से  तो  तजरबा मेरा
जिंदगी  की  है  बसर  हमने बेदारों की तरह

कट  गई  फिर  वो  जुबानें  ही गुफ्तगू वाली
बात  चलने  है  लगी  जबसे इशारों की तरह

सुबह  से  शाम  तलक   हसरतें  सुलगती है
बीते हैं  जीस्त  ये अपनी तो इजारों की तरह

अब तो  हर एक ही  आमाल  पे आंसू आए
लग रही है ये खुशी  भी तो खसारों की तरह

Monday, 5 November 2018

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है
मगर   वो माटी   के घर में   माटी का दीप  हालत पे रो रहा है

कहां वो टिम टिम सी रोशनी में नहाके रातें निखर रही थी
कहां ये आंखों में चुभते से उजाले दर दर में हो रहा है

कहां गयी अब वो सौंधी खुश्बू ये नफरतों सा निकल रहा है
मुहब्बतों के फसल उगाए थे शूल बनकर चुभो रहा है

रहा वो माजी में खोए हर पल सुहाने दिन थे सुहानी राते
पुराने लोगों को है खबर अब वो मोल माटी के खो रहा है

ये बात शहरो में है मिली पर हमारे तहज़ीब ये नही है
अभी वो माटी की सौंधी खुश्बू से मन प्रफुल्लित हो रहा है

नसीब इन बिजलियों की देखो लिबास है कांच के बदन पर
हवा से पानी से लड़ के दीपक वजूद अपना ये ढो रहा है

शहर है रोशन मगर वो बस्ती में तो उजाला हुआ नही है
खयाल तक ये नही किसी को पड़ोस चुल्हा क्यूँ रो रहा है

खड़ा है सरहद पे लाल तेरा ए भारती मां तू फिक्र मत कर
इसी वजह से तो मुल्क मेरा बेफिक्र होकर के सो रहा है

सुना है अब के भी आ न पाया जो सरहदों पे गया है बेटा
लगी है आंखें कभी से दर पर के सब्र भी अब तो खो रहा है

Thursday, 1 November 2018

जुगनूओ से अंधेरों को मिटाने वाले

जुगनूओ  से   अंधेरों  को  मिटाने  वाले
है  कहां  आज  भला  बात  बनाने वाले

क्या  भला  साथ  निभाएंगे भुलाने वाले
राह में  छोड़ के  जाएंगे  वो  जाने वाले

लद गए दिन वो वफाओ के निभाने वाले
अब कहाँ मिलते हैं वो शख्स पुराने वाले

रात  भर  राह में  बैठे  थे  चरागां  करके
पर  खबर ही  न लगी कौन थे आने वाले

ये  हवाओं  में  अभी  गर्द नजर  आती है
क्या  शहर  छोड़  चुके  शोर  मचाने वाले

इक दिया  रोज  मुंडेरों पे  जला करता था
जाने  क्या  बल्ब से घर अपने सजाने वाले

ईंट  गारो  से  भला  कौन  यहां  मिलता है
घर  में  रिश्ते  है  जरा  खास  पुराने  वाले

सो गए सुनते ही फटकार फकत गुरबत के
तिफ्ल  ने   देखे   नही  लाड़ लड़ाने  वाले

अब  परिंदे  भी   वहां  आने  से कतराते हैं
ताक  में   रहते  सदा   जाल बिछाने  वाले

शाख पे चांद वो अटका जो जरा पल पर को
थाम  कर   बैठ  गए  दिल  ये  जमाने  वाले

रात  बैठी    है   इंतजार   सहर   का  करते
रह  गए   जाने  कहाँ   रात  को  लाने  वाले

जो  यहां   बोते   मुहब्बत   थे  उगाते  खुश्बू
अब  नजर  आते  न  वो   अम्न  जगाने वाले

रूठ  तो  जाए  मगर  आज  ये  डर लगता है
अब  नही  रहते   यहां  कल  से  मनाने  वाले

अब के  त्योहार  में  बच्चों  को  नये  कपडे़ दूं
सोंचते   रह     ये  गये    रोज   कमाने  वाले

जगमगाते    हुए    दीयों से    शहर   रौशन है
देख  पाए    न    तले     दीप     जलाने वाले

कैसे   मै   भेज दूँ   दुख्तर को   यूं  तन्हा तन्हा
चार  कांधे   भी   न    डोली  के   उठाने  वाले

आस   रहती  है   जईफी  मे   जरा   मीठे  की
बोल   कड़वे  ही मिले   दिल को   दुखाने  वाले

खूब   मायूस  से   दिखते  हैं   यहाँ   सब  चेहरे
है   नदारद   ये   शहर   से   ही   हंसाने   वाले