रंज दिल से बुहार दो साहब
शादमानी नुहार दो साहब
मशवरे सब संभाल कर रक्खो
तल्खतर शय बिसार दो साहब
दफ्न कर के गुबार सीने में
मौज में ही गुजार दो साहब
चार दिन की ये जिंदगानी है
ख्वाब जैसी संवार दो साहब
चांद अटका है झाड़ियों पर ही
हाथ देकर उतार दो साहब
है बहुत सर्द सा दिसंबर ये
कोई सूरज उतार दो साहब
सर्द रातों है बरहना बेबस
बस कबा गर्म डार दो साहब
आज वादे पे बात ठहरी है
मत बहाने हजार दो साहब
हिज्र के दिन तवील है बेहद
वस्ल की रात वार दो साहब
लग रहे आंख में ये बोझल से
ख्वाब झूठे उतार दो साहब
बात अच्छे दिनों की थी साहब
अब ये चाहे उधार दो साहब