Thursday, 1 November 2018

जुगनूओ से अंधेरों को मिटाने वाले

जुगनूओ  से   अंधेरों  को  मिटाने  वाले
है  कहां  आज  भला  बात  बनाने वाले

क्या  भला  साथ  निभाएंगे भुलाने वाले
राह में  छोड़ के  जाएंगे  वो  जाने वाले

लद गए दिन वो वफाओ के निभाने वाले
अब कहाँ मिलते हैं वो शख्स पुराने वाले

रात  भर  राह में  बैठे  थे  चरागां  करके
पर  खबर ही  न लगी कौन थे आने वाले

ये  हवाओं  में  अभी  गर्द नजर  आती है
क्या  शहर  छोड़  चुके  शोर  मचाने वाले

इक दिया  रोज  मुंडेरों पे  जला करता था
जाने  क्या  बल्ब से घर अपने सजाने वाले

ईंट  गारो  से  भला  कौन  यहां  मिलता है
घर  में  रिश्ते  है  जरा  खास  पुराने  वाले

सो गए सुनते ही फटकार फकत गुरबत के
तिफ्ल  ने   देखे   नही  लाड़ लड़ाने  वाले

अब  परिंदे  भी   वहां  आने  से कतराते हैं
ताक  में   रहते  सदा   जाल बिछाने  वाले

शाख पे चांद वो अटका जो जरा पल पर को
थाम  कर   बैठ  गए  दिल  ये  जमाने  वाले

रात  बैठी    है   इंतजार   सहर   का  करते
रह  गए   जाने  कहाँ   रात  को  लाने  वाले

जो  यहां   बोते   मुहब्बत   थे  उगाते  खुश्बू
अब  नजर  आते  न  वो   अम्न  जगाने वाले

रूठ  तो  जाए  मगर  आज  ये  डर लगता है
अब  नही  रहते   यहां  कल  से  मनाने  वाले

अब के  त्योहार  में  बच्चों  को  नये  कपडे़ दूं
सोंचते   रह     ये  गये    रोज   कमाने  वाले

जगमगाते    हुए    दीयों से    शहर   रौशन है
देख  पाए    न    तले     दीप     जलाने वाले

कैसे   मै   भेज दूँ   दुख्तर को   यूं  तन्हा तन्हा
चार  कांधे   भी   न    डोली  के   उठाने  वाले

आस   रहती  है   जईफी  मे   जरा   मीठे  की
बोल   कड़वे  ही मिले   दिल को   दुखाने  वाले

खूब   मायूस  से   दिखते  हैं   यहाँ   सब  चेहरे
है   नदारद   ये   शहर   से   ही   हंसाने   वाले

No comments:

Post a Comment