वफा की राह में अब खूब पत्थर से निकल आए
छिपा पहलू में ही खंजर ये रहबर से निकल आए
शिकायत तो न थी फिर भी न जाने क्या हुआ ऐसा
शरारत ही शरारत में वो क्यूँ घर से निकल आए
जरा सी बात थी लेकिन लगी दिल में ये भीतर तक
जरा आवाज ऊंची की वो भीतर से निकल आए
ठिठुरता सर्द रातों में बिचारा बरहना बेबस
मजारों के लिए लेकिन ये चादर से निकल आए
जो ही मजलूम से पुछा कि रातें सर्द है कितनी
वो मुट्ठी भींच के दोनों यूं ही घर से निकल आए
पड़ा है सर्द रातों में बिचारा कांपता सूरज
जरा सा धूप दिखलाओ तो ये घर से निकल आए
अम्न है मुल्क में दहशत की ये बातें बेमानी है
सियासत कह रही जमहूर को डर से निकल आए
दिया दैरो हरम के आस्तानें में जले ऐसा
जहां में रोशनी के खूब मंजर से निकल आए
अंधेरों के सफर में साथ साया भी न था अपने
उजालों में न जाने कैसे लश्कर से निकल आए
फकत मुद्दा सियासत के लिए है राम का मंदिर
भला फिर रास्ता कैसे कोई दर से निकल आए
न मांगा राम ने मंदिर न मौला चाहे मस्जिद ही
बेमानी जिद के खातिर ही लश्कर से निकल आए
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