हादसों को धता बता दूँ क्या
जिंदगी को जरा सजा दूँ क्या
करके नाकाम साजिशें उसकी
मै भी हंसकर जरा दिखा दूँ क्या
मुश्किलें ताक पे ही बैठी है
हौसला मै उसे दिखा दूँ क्या
ख्वाहिशों के यतीम किस्से में
दर्द अपना कहीं छिपा दूँ क्या
क्यूँ रही है खुशी बेघर अक्सर
अब ये सारे शहर बता दूँ क्या
कुछ तो औकात का पता भी चले
आंख में ख्वाब सा सजा दूँ क्या
कुछ तो अहसासे मुफलिसी हो कम
दो घड़ी खुद को ही भुला दूँ क्या
तिरगी है शहर में फैली सी
तोड़ कर शम्स ही मै ला दूँ क्या
तजकिरा है मेरी ये चुप्पी का
खोल कर दिल सभी सुना दूँ क्या
आजमाना है सारे रिश्तों को
सबको हालात मै बता दूँ क्या
लोग खंजर लिए है हाथों में
राह में फूल मै बिछा दूँ क्या
No comments:
Post a Comment