हसरतें सीने में अरमान छिपा रक्खी हैं
शोर भी खूब जरूरत ने मचा रक्खी है
कौन सी शय है जरूरी और नाहक क्या है
बस यही जद्दोजहद मन में बिठा रक्खी है
हर तकाजे का रखा ध्यान है हरदम घर के
हमने औकात ये पैबंद में छिपा रक्खी हैं
साजिशें वक्त ने कुछ यूँ भी चली है अक्सर
वो खिलाफत में हवाओं को लगा रक्खी है
तारिकी बाद सहर रुक ही नहीं सकता है
राएगा शब ये यहां सबको डरा रक्खी है
उम्र भर जीस्त में कायम ही रही मुश्किलें
बस जरा होंठ पे मुस्कान बचा रक्खी है
मां ने हर रब्त सहेजा है बड़ी शिद्दत से
मां ने रिश्तों की महक खूब बचा रक्खी है
उसके कदमों पे जमाने की बला रक्खी है
मां के होठों पे तो हरदम ही दुआ रक्खी है
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