Monday, 12 November 2018

हसरतें सीने में अरमान छिपा रक्खी हैं


हसरतें  सीने में  अरमान  छिपा  रक्खी हैं
शोर  भी  खूब  जरूरत  ने मचा रक्खी है

कौन सी शय है जरूरी और नाहक क्या है
बस यही जद्दोजहद  मन में बिठा रक्खी है

हर तकाजे का रखा ध्यान है हरदम घर के
हमने  औकात ये  पैबंद में छिपा रक्खी हैं

साजिशें वक्त ने कुछ यूँ भी चली है अक्सर
वो खिलाफत में  हवाओं को लगा रक्खी है

तारिकी  बाद  सहर रुक ही नहीं सकता है
राएगा  शब ये  यहां  सबको डरा रक्खी है

उम्र भर जीस्त में  कायम ही रही मुश्किलें
बस जरा  होंठ पे  मुस्कान  बचा रक्खी है

मां ने  हर रब्त  सहेजा  है  बड़ी शिद्दत से
मां ने रिश्तों  की महक खूब बचा रक्खी है

उसके कदमों पे  जमाने की बला रक्खी है
मां के होठों पे तो हरदम ही दुआ रक्खी है

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