Friday, 22 January 2016

मेरे ही घर में रहता है औ मुझे नहीं जानता

रहता है हमसे जुदा जुदा फासले नही जानता
वो मेरे ही घर में रहता है औ मुझे नही जानता

नादान किस कदर  वो महबूब हमारा बनता है
हुजूम के साथ चलता है काफिले नही जानता

निकल जाता है परिंदा वो अनजान से सफर में
दिन रात का मुसाफिर है  घोंसले नही जानता

आया था कल जो आंखों में इक बुंद की तरह
ठहरा है आने जाने के सिलसिले नही जानता

शामों सहर वो भटकता ही रहता है जुस्तजू में
दीवानगी है जो इश्क की मंजिलें नही जानता

अपनी ही तरह दिल भी ये बस तन्हा पसंद है
ये भीड़ भरी जिंदगी ये महफिलें नही जानता

ये दिल भी बेचारा उम्र भर तलबगार रह गया
नामुराद है जो तकदीर के फैसले नहीं जानता

सजदे में सर झुक गया इक दर नमाजी बन के
इबादते इश्क दैरो हरम के चोचले नही जानता

Saturday, 9 January 2016

जीने के लिए सीधा सरल रास्ता नही मांगते

जीने के लिए  सीधा सरल रास्ता नही मांगते
मुश्किलात भी अपने लिए सस्ता नही मांगते

गुजर जाती है जूझते  गुमनाम जिंदगी यूं ही
मुफलिस कभी अखबार में चर्चा नही मांगते

सुकून की सुखी दो रोटी ईमान से मिल जाये
दाता से कोई फरमाईश औ बेजा नही मांगते

खुशियाँ उस घर  आंगन बरसती ही रहती है
बेटियों की कीमत पर जो    बेटा नही मांगते

बुढापा उस बाप का    तसल्ली से गुजरता है
बेटे जिसके बड़े होने पर  हिस्सा नही मांगते

मोहब्बत की बिसात जो रिश्ते कायम होते हैं
अपनो के ही   दरमियां वो धोखा नही मांगते

देख ली है जिंदगी की धुप छांव  सभी हमने
मुकद्दर से अब अपने लिए मौका नहीं मांगते

Monday, 4 January 2016

इस हिसाब से अपनी जिंदगी चलती रही

इस हिसाब से अपनी जिंदगी चलती रही
हसरतें मरती रही औ जरुरते चलती रही

रफ्ता रफ्ता करके यूं कारवां चलता रहा
हौले हौले दबे पांव   उम्र भी ढलती रही

मिजाज दुरुस्ती में हकीम भी ऐसा मिला
मर्ज था कुछ और दवा कुछ मिलती रही

रसोई में बरतन भी भुखे ही  टकराते रहे
घर में आज फिर नई कहानी पकती रही

धुप मेरे हिस्से की सब इमारतें निगल गई
ऊंची-ऊंची दीवार पे ख्वाहिशे सुखती रही

अनपढ़ सी है माँ मगर बेहद तजुर्बेकार है
जाहिर कभी न की मुफलिसी ढकती रही

बेचैन इस कदर किया बिसरी यादों ने हमे
सर्द सी रातो मे अपनी शायरी भीगती रही

Sunday, 3 January 2016

शुक्र है बेफिजूल फरमाईश नहीं करते

शुक्र है बेफिजूल ख्वाहिश नहीं करते
बेकारी में बच्चे फरमाईश नहीं करते

ऐ नसीब बख्श दे  कुछ तो रहम कर
गाहे ब गाहे यूं आजमाईश नही करते

जितनी मुश्किले मौला डाल झोली में
रहमतो की हम तेरे पैमाईश नही करते

मांग लेना आखिरी कतरा भी खुन का
इश्क में कमजर्फ गुंजाइश नहीं करते

चाक जिगर लिए फिरते हैं  यूं तो हम
हर मुंह मे गमों की नुमाइश नहीं करते

बहाते थे कल तक तेरे मयखाने दरिया
गैरत में कोई तलब ऐ वाईज नहीं करते

Saturday, 2 January 2016

कुछ नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई

कुछ नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई
यूं तो देख रखे हैं हमने भी नये साल कई

ठहरी हुई सी जिंदगी और नाकबूल मन्नते
कुछ न कर पाने के दिल में है मलाल कई

साजिशों के दौर भी कुछ ऐसे  चल रहे है
जरा जरा सी बात पर देखे है  बवाल कई

नफरतों की नई नई     पौध उपजने लगी
बिगडे से हालात में बिगड़े से हैं चाल कई

सच की जुबां बनने कोई जुबां नहीं मिलते
झुठ के साथ मे खड़े दिखते हैं   ढाल कई

आज भी परिंदे उस शजर मंडराते रहते हैं
तरक्की की दौर जिसके कट गये डाल कई

जिस बड़े से घर में खुशियां खेला करती थी
उन खुशियों के दरमियां देखे हैं दिवाल कई

तारीखों के साथ ये   मंजर बदल जाते कैसे
चुभते रहते इस तरह से जहन में सवाल कई

Friday, 1 January 2016

वही दिन है वहीं रात फिर नया क्या है

वहीं दिन है वहीं रात फिर नया क्या है
फकत तारीख के  सिवा बदला क्या है

सहमे सहमे से      लोग नजर आते है
चेहरों पर है उदासियां     हुआ क्या है

दिन गया महीना गया साल गुजर गया
तेरी यादों के सिवा   कुछ बचा क्या है

चंद लम्हो की सौगात   अपने हक रही
वर्ना बचके तेरी नफरतों से रहा क्या है

सुब्ह फिर    जिंदगी ढुंढने निकल पड़ा
हर शाम को घर  पुछता है मिला क्या है

चेहरा मेरा बखूबी से पढ लेते हैं बाबूजी
परेशान देख पुछ ही लेते हैं हुआ क्या है

माँ ने हाथ फेरे मै   मुश्किलात भुल गया
बेखबर रहे है हम इससे कि दुआ क्या है