Monday, 4 January 2016

इस हिसाब से अपनी जिंदगी चलती रही

इस हिसाब से अपनी जिंदगी चलती रही
हसरतें मरती रही औ जरुरते चलती रही

रफ्ता रफ्ता करके यूं कारवां चलता रहा
हौले हौले दबे पांव   उम्र भी ढलती रही

मिजाज दुरुस्ती में हकीम भी ऐसा मिला
मर्ज था कुछ और दवा कुछ मिलती रही

रसोई में बरतन भी भुखे ही  टकराते रहे
घर में आज फिर नई कहानी पकती रही

धुप मेरे हिस्से की सब इमारतें निगल गई
ऊंची-ऊंची दीवार पे ख्वाहिशे सुखती रही

अनपढ़ सी है माँ मगर बेहद तजुर्बेकार है
जाहिर कभी न की मुफलिसी ढकती रही

बेचैन इस कदर किया बिसरी यादों ने हमे
सर्द सी रातो मे अपनी शायरी भीगती रही

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