जीने के लिए सीधा सरल रास्ता नही मांगते
मुश्किलात भी अपने लिए सस्ता नही मांगते
गुजर जाती है जूझते गुमनाम जिंदगी यूं ही
मुफलिस कभी अखबार में चर्चा नही मांगते
सुकून की सुखी दो रोटी ईमान से मिल जाये
दाता से कोई फरमाईश औ बेजा नही मांगते
खुशियाँ उस घर आंगन बरसती ही रहती है
बेटियों की कीमत पर जो बेटा नही मांगते
बुढापा उस बाप का तसल्ली से गुजरता है
बेटे जिसके बड़े होने पर हिस्सा नही मांगते
मोहब्बत की बिसात जो रिश्ते कायम होते हैं
अपनो के ही दरमियां वो धोखा नही मांगते
देख ली है जिंदगी की धुप छांव सभी हमने
मुकद्दर से अब अपने लिए मौका नहीं मांगते
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