Friday, 22 January 2016

मेरे ही घर में रहता है औ मुझे नहीं जानता

रहता है हमसे जुदा जुदा फासले नही जानता
वो मेरे ही घर में रहता है औ मुझे नही जानता

नादान किस कदर  वो महबूब हमारा बनता है
हुजूम के साथ चलता है काफिले नही जानता

निकल जाता है परिंदा वो अनजान से सफर में
दिन रात का मुसाफिर है  घोंसले नही जानता

आया था कल जो आंखों में इक बुंद की तरह
ठहरा है आने जाने के सिलसिले नही जानता

शामों सहर वो भटकता ही रहता है जुस्तजू में
दीवानगी है जो इश्क की मंजिलें नही जानता

अपनी ही तरह दिल भी ये बस तन्हा पसंद है
ये भीड़ भरी जिंदगी ये महफिलें नही जानता

ये दिल भी बेचारा उम्र भर तलबगार रह गया
नामुराद है जो तकदीर के फैसले नहीं जानता

सजदे में सर झुक गया इक दर नमाजी बन के
इबादते इश्क दैरो हरम के चोचले नही जानता

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