Sunday, 22 September 2019

है ये राहत की खबर मसनदे साही के लिए

है ये  राहत की  खबर  मसनदे साही  के लिए
उसपे   उंगली  न उठी   कोई  तबाही के लिए

राहतें   खूब बंटी   मुल्क में   बस   कागज पर
मुर्दे   उठकर के   नही आए   गवाही  के लिए

रोज   दम    तोड़ती    बेचैन    तमन्ना    बेबस
कुछ ये कमबख्त  जरूरत के  पनाही के लिए

जिनके  कांधों पे  हिफाजत  की है जिम्मेदारी
महकमा   खूब है   मशहूर    उगाही   के लिए

कांप  उट्ठो  न  कभी  देख के  अखबार  कहीं
अपने  मेयार   गिराओ  न    इलाही   के लिए

मसअला  अब  यहां  कोई  कहाँ  हल होता है
सब्ज रखते हैं हर इक जख्म सदा ही के लिए

जुर्म को  डर नही  कानून  अदालत  का कोई
हर  मशक्कत  है यहां बस  बेगुनाही  के लिए

और लफ्जों को  करो तल्ख  चुभाओ  नश्तर
शोर  दस्तूर  है  हर पल  खैर ख्वाही  के लिए

गुदगुदाते  हुए   अहसास  न  मैं   लिख पाया
मन हो भारी  तो लिखूं  कैसे ह हा ही के लिए

अजीज बनते थे कल जो सारे न जाने अब वो किधर गये हैं

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अजीज  बनते थे  कल जो सारे  न जाने अब वो किधर गये हैं
जरा सी  मुश्किल  घड़ी जो आयी  तमाम  रिश्ते  बिखर गये हैं

कहा  जो  करते थे  साथ  देने  की   उम्र भर  हर   मुसीबतों में
बचा के  दामन   निकल गये  वो   मुसीबतें  देख   डर   गये हैं

न हमने   हारी   कभी भी  हिम्मत  हरिक हालात को  जिया है
बड़े ही   कमजोर  दिल थे  वो सब  मिला अंधेरा  सिहर गये हैं

निखर निखर के निकल के आया तपा है जितना वजूद अपना
खराब  माटी थे  कल को  गौहर के जैसे  अब हम संवर गये हैं

भुलावे   भर हैं   तमाम रिश्ते   न  काम  आते   कोई समय पर
यकीन  कायम  किया है  खुद पर  फरेब  खाकर  सुधर गये हैं

हालात जरा बद है ये बदतर तो नही है

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हालात  जरा  बद  है  ये  बदतर  तो नही है
है  शुक्र  किसी  हाथ  में  पत्थर  तो नही है

कुछ लोग खफा हैं जरा सिस्टम से यहां पर
ये  मामला  है घर का  कोई  डर  तो नही है

है  फिक्र में  सरकार  न तु  फिक्र  जरा कर
फाका कशी  दो चार  ये  दुष्कर  तो नही है

गर  झांकता है  शम्स सुराख़ो से हुआ क्या
छप्पर है  तेरे  सर पे   तु   बेघर  तो नही है

हर  एक  निवाले  पे  नजर  हुक्मरां  की है
कुछ  कह रहे हैं  ये कोई  महशर तो नही है

जमहूर     जमुरे  की  तरह     नाच  रहा है
अच्छे दिनों से   ये कोई  कमतर तो नही है

लगता है उसे  दोष सभी   लड़कियों  में है
घर उसके पता कर जरा  दुख्तर तो नही है

मिलने को  चले  आए हैं  कुछ रब्त  पुराने
तस्कीन  करो  पहलू  में  खंजर  तो नही है

बस आग उगलते है  सहर शाम  तलक वो
देखो  तो   कहीं  पेट में   अख्तर तो नही है

ख्वाहिश है  सभी  दर्द  मै  गंगा  में  बहा दूं
पर दिल से है निस्बत  कोई बेघर तो नही है

नाकामियों से  खौफ  न खा हौसला तु रख
मंजिल  की है  तु राह में  दर दर  तो नही है

घबराए से  कुछ लोग  यकीनन है  यहां पर
इतनी ही  गनीमत है  वो थर थर तो नही है

Tuesday, 17 September 2019

ख्वाब देखूंगा तो अखबार में आ जाएगा

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ख्वाब  देखूंगा  तो  अखबार  मे  आ जायेगा
कुछ  हकीकत   सरेबाजार  मे   आ  जायेगा

सांस   लेता हूँ    जमाने से  छिपा  कर के  मै
वरना कल को वो भी इश्तेहार में आ जायेगा

मै हूँ मुफलिस इक मुद्दा हूँ सियासत के लिए
तंग   हालात   भी    दरकार में   आ जायेगा

हर  निवाले  पे   नजर   मेरी   रखी   जायेगी
मेरा   किरदार     सरोकार  में    आ  जायेगा

बेबसी    बिकने    लगेंगी   मेरी   चौराहों पर
मेरा  ये  जिस्म भी   व्यापार  में  आ जायेगा

मेरे कांधो  पे ही चढ़ कर के शहर का लुच्चा
देख लेना  अब कि  सरकार में   आ जायेगा

ऐ सुखनवर   तू न गुस्ताखी   यूँ कर  रहने दे
राएगा    तु भी    गुनहगार   में   आ जायेगा

है  अभी   अलहदा   किरदार  जुदा है सबसे
तू भी  इस शहर के   संस्कार में  आ जायेगा

Monday, 16 September 2019

बहुत करीब से गुजरी है अजनबी की तरह

बहुत करीब से गुजरी है अजनबी की तरह
ये जिंदगी न मिली हमसे जिंदगी की तरह

तमाम  उम्र   उदासी  के  दरमियां गुजरी
लगे हैं अब ये उदासी कोई खुशी की तरह

अधुरा चांद लगे मेरा कोई हमसाया
अधूरापन ये लगे अब तो बेबसी की तरह

नजर को ख्वाब न दो आज अब उजालों के
लगे हैं अब ये उजाले भी तिरगी की तरह

हरेक सांस लगे हैं लगान के जैसे
गुजरते उम्र के हर लम्हे खुदखुशी की तरह

कि बदहवास चली जा रही हैं उम्मीदें
दिखे हैं मोड़ पे कुछ चीज रोशनी की तरह

Saturday, 7 September 2019

नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं

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नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं
रिश्तों के दरमियां ही हूँ सबसे जुदा हूँ मैं

ये जिस्मो खाक से कोई खुद को संवार ले
इतना न अपने आप में भी अब बचा हूँ मैं

मत दो मुझे खैरात उजाले जरा से तुम
जुगनू से ना मिटेंगे अंधेरा घना हूँ मैं

गुम है सुकून चैन अमन शहर से मियां
आलम ये दहशतों का कहां सो रहा हूँ मैं

अंगड़ाई जुल्फ आईना ख्वाबों गुलाब चांद
अब मुफलिसी से टूट सभी को भुला हूँ मैं

सजदा  इबादतें  ये  जियारत  है  राएगा
उलझी सी जिंदगी है ये उलझा हुआ हूँ मैं

नजरें ये भीग जाती है अखबार देखकर

·221 2121 1221 212
नजरे ये भीग जाती है अखबार देखकर
खबरे भी अब तो आ रही बाजार देख कर

कोने मे घर के जो पडी़ चाकी खामोश है
खाली कनस्तर रो रहे त्योहार देखकर

माटी के चुल्हे ने भी तो अवकाश ले लिया
बदले हुए समय की ये सरकार देख कर

आंगन हरा भरा था वो बच्चो के शोर थे
खामोश सारे मौज हैं दीवार देख कर

रिश्ते संभाले हमने तो मोती के जैसे ही
सबने निभाया हमसे इश्तेहार देख कर

देखे बदलते लोग जमाने के साथ साथ
दिल भर गया है माँ का ये पुचकार देख कर

अपनी ही साख से बिछड़ा हुआ पत्ता हूँ मै

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अपनी ही साख से बिछडा हुआ पत्ता हूँ मै
दिल जरा  पास तो आ  खूब ही तन्हा हूँ मै

रोज ही ख्वाब को बेचा है जरुरत के लिए
वक्त से  जूझता  बेबस  सा वो लम्हा हूँ मै

अपने मतलब की सभी बांट लेते आपस में
घर पे आता है जो अखबार का पन्ना हूँ मै

कल जो बुनियाद था घर का उसे भूले है सभी
राएगा  फालतू  सा  अब  कोई रिश्ता हूँ मै

शह्र में  सबने  तगाफूल है किया जिसको सदा
क्या सियासत का उछाला कोई मुद्दा हूँ मै

जैसे  पैबंद  लगा  हो कोई   मंहगा  कपड़ा
यूँ समझता हूं मै खुद को कोई धोखा हूँ मै

जिंदगी खुब ही शिद्दत से तपी है साहब
कश्मकश मे ही जरा फिर भी तो उलझा हूँ मै

चुभती जह्न में है कहकहो की आवाजें
दायरों में ही बंधी सोच मे फिरता हूँ मै

Thursday, 5 September 2019

आंखों में लग के काजल फैला जरूर होगा

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आंखों में लग के काजल फैला जरुर होगा
रिश्ता लिबास बन कर मैला जरुर होगा

उम्मीद हो वफा की चादर से कैसे साहब
हालात हर कदम पर रूसवा जरुर होगा

हम आज अजनबी से जो शहर में है तेरे
रिश्ता कोई  दहर से अपना जरुर होगा

खुश्बू महक ये कैसे यूँ खोने अब लगी है
अपनो के दरमियां ही  धोखा जरुर होगा

ये जिक्र फिक्र तेरा    ख्वाबों खयाल  तेरे
कुछ इसके भी सिवा तो चर्चा जरुर होगा

सिक्कों की कद्र ज्यादा रिश्तों से हो गई जब
अपनो ने तंग आकर छोडा जरुर होगा

है रक्त में नहा कर  अखबार आज आया
कल हादसा कहीं पर गुजरा जरुर होगा

अखबार मे ही भुखा   रोटी लपेट लाया
संसद पटल में कल ये   मुद्दा जरुर होगा