·221 2121 1221 212
नजरे ये भीग जाती है अखबार देखकर
खबरे भी अब तो आ रही बाजार देख कर
कोने मे घर के जो पडी़ चाकी खामोश है
खाली कनस्तर रो रहे त्योहार देखकर
माटी के चुल्हे ने भी तो अवकाश ले लिया
बदले हुए समय की ये सरकार देख कर
आंगन हरा भरा था वो बच्चो के शोर थे
खामोश सारे मौज हैं दीवार देख कर
रिश्ते संभाले हमने तो मोती के जैसे ही
सबने निभाया हमसे इश्तेहार देख कर
देखे बदलते लोग जमाने के साथ साथ
दिल भर गया है माँ का ये पुचकार देख कर
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