है ये राहत की खबर मसनदे साही के लिए
उसपे उंगली न उठी कोई तबाही के लिए
राहतें खूब बंटी मुल्क में बस कागज पर
मुर्दे उठकर के नही आए गवाही के लिए
रोज दम तोड़ती बेचैन तमन्ना बेबस
कुछ ये कमबख्त जरूरत के पनाही के लिए
जिनके कांधों पे हिफाजत की है जिम्मेदारी
महकमा खूब है मशहूर उगाही के लिए
कांप उट्ठो न कभी देख के अखबार कहीं
अपने मेयार गिराओ न इलाही के लिए
मसअला अब यहां कोई कहाँ हल होता है
सब्ज रखते हैं हर इक जख्म सदा ही के लिए
जुर्म को डर नही कानून अदालत का कोई
हर मशक्कत है यहां बस बेगुनाही के लिए
और लफ्जों को करो तल्ख चुभाओ नश्तर
शोर दस्तूर है हर पल खैर ख्वाही के लिए
गुदगुदाते हुए अहसास न मैं लिख पाया
मन हो भारी तो लिखूं कैसे ह हा ही के लिए
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