राम बनने की सभी में लालसा भरपूर है
राम के लक्षण से हर किरदार कोसों दूर है
झूठ मक्कारी दिखावा लोभ में लिपटे सभी
त्याग मर्यादा न संयम नाम भी मंजूर है
फुल कर कुप्पा हुए हैं दंभ से सब इस कदर
बस बड़ा दिखने की चाहत में ही सारे चूर है
बांटते फिरते हैं साधू संत मंदिर में बहुत
घर में बैठे बुढ़े मां अर बाप बस मजबूर हैं
हक तो लेने के सभी को याद है इस मुल्क से
जब निभाना फर्ज हो जज़्बे सभी काफूर है
लाए हैं लिखवा वसीयत में शराफत हर कोई
फिर गलत ये कौन करता है समझ से दूर है
फूंकते हर साल सब रावण को हर्षोल्लास से
फिर से जी उठता है वो सदियों से ये दस्तूर है
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