Tuesday, 15 October 2019

जमाने में सबसे बुरा आदमी हूँ

122 122 122 122
जमाने में सबसे बुरा आदमी हूँ
जरा हूँ मैं इंसा जरा आदमी हूँ

मुकम्मल जरुरत की फेहरिस्त लेकर
मै बाजार को ताकता आदमी हूँ

कभी हसरतों की कबर खोदता हूँ
हकीकत से मै भागता आदमी हूँ

कहां तक करेगा रफूगर रफू अब
कि बस चिथड़े ढांपता आदमी हूँ

धरी आंच पर हर कदम जिंदगी ये
अजाबो से मै जूझता आदमी हूँ

हवाओं के रव में चला जा रहा हूँ
मै बस वक्त को भांपता आदमी हूँ

हिमाकत की हिम्मत न रखता हूँ पर भी
ये शह मात को जानता आदमी हूँ

No comments:

Post a Comment