Thursday, 27 December 2018

हादसे बख्श दे मेरा ये शहर जाने दे

हादसे बख्श दे मेरा ये शहर जाने दे
वक्त ने ढाए यहां खूब कहर जाने दे

लोग मिलते ही कहां अब है शहर में जिंदा
क्या अकेले मै करूं मुझको भी मर जाने दे

सांस लेना ही फकत जीने की निशानी है
है यही बात खरी बात अगर जाने दे

दैर के नाम पे उलझा न ये मसला इतना
दायरे सोंच के मजहब के ईतर जाने दे

लोग फुर्सत से नही अब है मिले मतलब से
हर किसी पे है यही आज असर जाने दे

ये वफाएं हैं महज आज किताबी बातें
ये हकीकत में नही आते नजर जाने दे

कल वो चौखट में रहे दिल ये लेकर अपना
क्या हुआ आज गया है जो मुकर जाने दे

रोते चेहरे को फकत पल में हंसा देते थे
अब गया हाथ से अपने ये हुनर जाने दे

ये सियासत को फकत वोट से ही मतलब है
बेबसी भूख से आवाम को मर जाने दे

झोपड़ी में है अंधेरा सा शहर जगमग है
बात ये खास नही यूं न बिफर जाने दे

उजालों का ये जलसा देख डर कर बैठ जाएगा

उजालों  का ये  जलसा देख  डरकर बैठ जाएगा
तले दीपक  अंधेरा  आज  छिपकर  बैठ जाएगा

गरीबों  की  वो  बस्ती  में  रहेगी  तिरगी  कायम
फकत फिर आज वो मुफलिस रोकर बैठ जाएगा

उरूज पर चढ़ के सूरज लाल पीला हो रहा बेहद
उफक  पर  शाम तक  ये जर्द पैकर बैठ जाएगा

इधर  सूरज  के जाते ही  फकत  वो रात आएगी
बिछा  काली सी  चादर चांद उस पर बैठ जाएगा

शिकस्ता पर लिए वो आसमां में उड़ नही सकता
परिंदा  थक गया  तो  छत पे आकर बैठ जाएगा

परिंदे   का  नही   दैरो हरम   से  कोई  वाबस्ता
शिकम  खातिर   दाने चार   पाकर   बैठ जाएगा

समय  पर  खाद  पानी  डालते रहना मुहब्बत के
अगर  बुनयाद हो  कमजोर  तो  घर  बैठ जाएगा

अभी  उफान  पर  होने  सबब  ये शोर  ज्यादा है
जरा  थमने  दे  दरया  को  ये पत्थर  बैठ जाएगा

सियासत  के लिए  मुद्दा  फकत  दैरो हरम  ठहरा
मिली  कुर्सी  सभी  कुछ वो भुलाकर बैठ जाएगा

तपा है  आग में  लोहा  बना है  मुल्क  के खातिर
जो  देखे  हौसला   इनका   सिकंदर  बैठ जाएगा

Monday, 3 December 2018

जिंदगी ने आजमाया देर तक

जिंदगी   ने    आजमाया  देर तक
सोंच  ये  दिल  मुस्कुराया  देर तक

ख्वाब थे  शीशे के  सब पिघल गये
आंच ने  दिल को  जलाया देर तक

मुख्तलिफ  सी ही हवा के दरमियां
इक दिया फिर टिमटिमाया देर तक

हौसलो  के   आखिरी  मुकाम पर
वो  परिंदा   फड़फड़ाया   देर तक

दिल को  बहलाने  गये थे बज्म में
तेरी  महफिल ने  रुलाया  देर तक

चाहतें  थी   चांद  छूने   की मगर
कुछ  तकाजो  ने  भगाया देर तक

दुरियां      मजबूरियां    तन्हाईयाँ
सबने मिलकर ही  सताया देर तक

Friday, 30 November 2018

रंज दिल से बुहार दो साहब शादमानी नुहार दो साहब मशवरे सब संभाल कर रक्खो तल्खतर शय बिसार दो साहब दफ्न कर के गुबार सीने में मौज में ही गुजार दो साहब चार दिन की ये जिंदगानी है ख्वाब जैसी संवार दो साहब चांद अटका है झाड़ियों पर ही हाथ देकर उतार दो साहब है बहुत सर्द सा दिसंबर ये कोई सूरज उतार दो साहब सर्द रातों है बरहना बेबस बस कबा गर्म डार दो साहब आज वादे पे बात ठहरी है मत बहाने हजार दो साहब हिज्र के दिन तवील है बेहद वस्ल की रात वार दो साहब लग रहे आंख में ये बोझल से ख्वाब झूठे उतार दो साहब बात अच्छे दिनों की थी साहब अब ये चाहे उधार दो साहब

रंज  दिल से  बुहार दो साहब
शादमानी   नुहार  दो  साहब

मशवरे सब संभाल कर रक्खो
तल्खतर शय बिसार दो साहब

दफ्न  कर के  गुबार   सीने में
मौज  में  ही  गुजार दो साहब

चार दिन  की  ये  जिंदगानी है
ख्वाब  जैसी  संवार  दो साहब

चांद अटका है  झाड़ियों पर ही
हाथ  देकर   उतार  दो  साहब

है  बहुत  सर्द  सा  दिसंबर  ये
कोई  सूरज   उतार  दो साहब

सर्द  रातों   है   बरहना  बेबस
बस  कबा  गर्म  डार दो साहब

आज  वादे  पे  बात  ठहरी है
मत  बहाने   हजार  दो साहब

हिज्र  के  दिन  तवील है बेहद
वस्ल  की  रात  वार दो साहब

लग रहे  आंख में  ये बोझल से
ख्वाब  झूठे   उतार  दो  साहब

बात  अच्छे दिनों की थी साहब
अब  ये  चाहे  उधार  दो साहब

Sunday, 25 November 2018

वफा की राह में अब खूब पत्थर से निकल आए

वफा की  राह में  अब खूब  पत्थर से निकल आए
छिपा  पहलू में  ही खंजर ये रहबर से निकल आए

शिकायत तो न थी फिर भी न जाने क्या हुआ ऐसा
शरारत  ही शरारत  में  वो क्यूँ घर से निकल आए

जरा सी बात थी लेकिन लगी दिल में ये भीतर तक
जरा  आवाज ऊंची  की  वो भीतर से निकल आए

ठिठुरता   सर्द   रातों  में    बिचारा  बरहना  बेबस
मजारों  के लिए  लेकिन  ये  चादर से निकल आए

जो ही  मजलूम  से  पुछा  कि  रातें सर्द है कितनी
वो  मुट्ठी  भींच  के  दोनों यूं ही घर से निकल आए

पड़ा  है   सर्द   रातों  में   बिचारा  कांपता  सूरज
जरा  सा  धूप दिखलाओ तो ये घर से निकल आए

अम्न  है  मुल्क में  दहशत  की  ये  बातें बेमानी है
सियासत  कह रही  जमहूर को डर से निकल आए

दिया    दैरो हरम    के   आस्तानें   में  जले  ऐसा
जहां में  रोशनी  के  खूब  मंजर  से  निकल  आए

अंधेरों  के  सफर  में  साथ  साया  भी न था अपने
उजालों  में न  जाने  कैसे  लश्कर से  निकल आए

फकत  मुद्दा  सियासत  के लिए  है  राम का मंदिर
भला  फिर  रास्ता  कैसे  कोई  दर से निकल आए

न मांगा  राम ने  मंदिर  न  मौला  चाहे  मस्जिद ही
बेमानी  जिद के  खातिर ही  लश्कर से निकल आए

Saturday, 17 November 2018

ये जिंदगी को समझ ले तू ख्वाब से पहले

ये जिंदगी को समझ ले तू ख्वाब से पहले
लगे  हैं  खूब  हंसी  ये  अजाब  से पहले

उधार की है  खुशी  चार दिन की है सांसे
फकत  ये जान ले तू भी हिसाब से पहले

नजर है आते सभी  साफ साफ दुनिया में
तमाम   खेल   मदारी    सराब  से पहले

बखूब   जान ले   किरदार  कैसे  कैसे हैं
ये आदमी  के  यहां  पर  नकाब से पहले

शहर में ईद का जिम्मा  तो चांद पे ही था
न आए  छत पे  सनम  माहताब से पहले

लगाए  आस थे  हम  खूब जिंदगी से भी
मिले हैं  खार ही  हमको गुलाब से पहले

अदब से पेश  वो आने लगा है अब बेहद
सलाम  खत में लिखा है  जवाब से पहले

जुबां जुबां  पे है किस्सा तमाम उनका ही
शहर में  खूब है  चर्चा  किताब  से पहले

हमें  यकीन था  की  ख्वाब में वो आयेंगे
मगर  ये नींद  न आयी  जनाब  से पहले

उफक में जो ये चमक सा दिखाई देता है
नये सहर की है  दस्तक ये बाब से पहले

मलाल  देख  तू  अपने  तमाम फुर्सत से
वो आदमी था भला कल खराब से पहले

खुशी के दौर में लहजा नही बदलते हम

खुशी के दौर में  लहजा  नही बदलते हम
मिजाज  नर्म  जरा सा  नही  बदलते हम

ख़राशें  वक्त की  पड़ती  जरुर  चेहरे पर
मगर लिहाज का  रुतबा नही बदलते हम

करार  पाने  को  दर दर  भटकते रहते हैं
महज तलाश में  सहसा  नही बदलते हम

सुकून  चैन   मिले   बस  यही  तमन्ना है
इसी  के  वास्ते  इतना  नहीं  बदलते हम

नयी  नसल है  नये  है  जमाने  के मंजर
अदब  लिहाज  सलीका  नही बदलते हम

थकन के बोझ है छाले है पांव में फिर भी
शिकम  के वास्ते  रस्ता  नही बदलते हम

उम्मीद   हसरतें   आंसू   उदास   तन्हाई
मलाल  देख के  रिश्ता  नही  बदलते हम

ए  जिंदगी  तेरे  जलवों से खौफ खाते हैं
मगर  ये  तौर  तरीका  नही  बदलते हम

सिसकते रहते हैं छाले ये पांव के लेकिन
सुकून  वास्ते  रस्ता   नही  बदलते  हम

जुदा है  जात  उसूलों इमां से सबका ही
ये मोजिजा से  अकीदा नही बदलते हम

दिल को ये दिल्लगी नही आती

दिल को ये दिल्लगी नही आती
रोते हैं  तो   हंसी   नही आती

ये  सलीका  मिला है बरसों में
यूं  ही  शाइस्तगी   नही आती

शर्म को कर लिया कोई अगवा
वो नजर अब कभी नही आती

इक खिलौने की रह गई हसरत
लौट  कर  जिंदगी  नही आती

घिर  गई  है   इमारतों  में  वो
हम तलक  धूप ही  नही आती

आरजू     हसरतें      तमन्नाएं
आंख से  बह गयी  नही आती

आईना  चांद  जुल्फ   अंगड़ाई
भूख   के  रहबरी  नही  आती

सलवटें  जिंदगी   की  कैसी है
इस्तरी  से   सही    नही आती

वो चरागां किया  शहर फिर भी
मेरे  घर   रोशनी   नही  आती

दर्द   को    घूंट  घूंट   पीते  हैं
ऐसे  ही   शायरी   नही  आती

हादसों को धता बता दूँ क्या


हादसों   को   धता    बता दूँ क्या
जिंदगी   को    जरा  सजा दूँ क्या

करके   नाकाम   साजिशें  उसकी
मै भी  हंसकर  जरा दिखा दूँ क्या

मुश्किलें    ताक    पे  ही  बैठी है
हौसला   मै    उसे  दिखा  दूँ क्या

ख्वाहिशों   के    यतीम  किस्से में
दर्द   अपना   कहीं   छिपा दूँ क्या

क्यूँ  रही  है   खुशी  बेघर  अक्सर
अब  ये  सारे   शहर   बता दूँ क्या

कुछ  तो  औकात का पता भी चले
आंख  में  ख्वाब  सा  सजा दूँ क्या

कुछ तो अहसासे मुफलिसी हो कम
दो घड़ी  खुद को  ही  भुला दूँ क्या

तिरगी   है   शहर    में  फैली  सी
तोड़ कर  शम्स   ही  मै ला दूँ क्या

तजकिरा   है   मेरी   ये  चुप्पी का
खोल कर  दिल  सभी सुना दूँ क्या

आजमाना  है   सारे    रिश्तों   को
सबको  हालात   मै   बता  दूँ क्या

लोग   खंजर    लिए   है  हाथों में
राह  में   फूल   मै   बिछा  दूँ क्या

Monday, 12 November 2018

हसरतें सीने में अरमान छिपा रक्खी हैं


हसरतें  सीने में  अरमान  छिपा  रक्खी हैं
शोर  भी  खूब  जरूरत  ने मचा रक्खी है

कौन सी शय है जरूरी और नाहक क्या है
बस यही जद्दोजहद  मन में बिठा रक्खी है

हर तकाजे का रखा ध्यान है हरदम घर के
हमने  औकात ये  पैबंद में छिपा रक्खी हैं

साजिशें वक्त ने कुछ यूँ भी चली है अक्सर
वो खिलाफत में  हवाओं को लगा रक्खी है

तारिकी  बाद  सहर रुक ही नहीं सकता है
राएगा  शब ये  यहां  सबको डरा रक्खी है

उम्र भर जीस्त में  कायम ही रही मुश्किलें
बस जरा  होंठ पे  मुस्कान  बचा रक्खी है

मां ने  हर रब्त  सहेजा  है  बड़ी शिद्दत से
मां ने रिश्तों  की महक खूब बचा रक्खी है

उसके कदमों पे  जमाने की बला रक्खी है
मां के होठों पे तो हरदम ही दुआ रक्खी है

ये जिंदगी को समझ ले तू ख्वाब से पहले

ये जिंदगी को समझ ले तू ख्वाब से पहले
लगे  हैं  खूब  हंसी  ये  अजाब  से पहले

उधार की है  खुशी  चार दिन की है सांसे
फकत  ये जान ले तू भी हिसाब से पहले

नजर है आते सभी  साफ साफ दुनिया में
तमाम   खेल   मदारी    सराब  से पहले

बखूब   जान ले   किरदार  कैसे  कैसे हैं
ये आदमी  के  यहां  पर  नकाब से पहले

शहर में ईद का जिम्मा  तो चांद पे ही था
वो छत पे  रात  दिखा  माहताब से पहले

लगाए  आस थे  हम  खूब जिंदगी से भी
मिले हैं  खार ही  हमको गुलाब से पहले

अदब से पेश  वो आने लगा है अब बेहद
सलाम  खत में लिखा है  जवाब से पहले

जुबां जुबां  पे है किस्सा तमाम उनका ही
शहर में  खूब है  चर्चा  किताब  से पहले

हमें  यकीन था  की  ख्वाब में वो आयेंगे
मगर  ये नींद  न आयी  जनाब  से पहले

उफक में जो ये चमक सा दिखाई देता है
नये सहर की है  दस्तक ये बाब से पहले

मलाल  देख  तू  अपने  तमाम फुर्सत से
वो आदमी था भला कल खराब से पहले

Tuesday, 6 November 2018

दौर गुजरा है ये भी और हिसारों की तरह

दौर  गुजरा है  ये भी  और हिसारों की तरह
है  सुलगते  से  रहे  ख्वाब  शरारों की तरह

रोशनी  में  है   नहाया   ये  शहर  लगता है
क्यूँ  अंधेरा सा  है  बस्ती में गुबारों की तरह

हर तरफ  मुल्क में  जलसा है  हंसी मंजर है
झोपड़ी  आज भी  लगती है मजारों की तरह

पेट  की  आग  में  पकते  हैं  दिये  माटी के
ये  सबब  ही है  जरा मंहगे  हजारों की तरह

काश  वो  हमसे  कभी ये भी तो पुछे आकर
क्यूँ चले आते हो तुम ख्वाब में यारों की तरह

है  जियादा  ही   उमर  से  तो  तजरबा मेरा
जिंदगी  की  है  बसर  हमने बेदारों की तरह

कट  गई  फिर  वो  जुबानें  ही गुफ्तगू वाली
बात  चलने  है  लगी  जबसे इशारों की तरह

सुबह  से  शाम  तलक   हसरतें  सुलगती है
बीते हैं  जीस्त  ये अपनी तो इजारों की तरह

अब तो  हर एक ही  आमाल  पे आंसू आए
लग रही है ये खुशी  भी तो खसारों की तरह

Monday, 5 November 2018

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है

अजब है जलसा ये मुल्क में सब तरफ ही जगमग सा हो रहा है
मगर   वो माटी   के घर में   माटी का दीप  हालत पे रो रहा है

कहां वो टिम टिम सी रोशनी में नहाके रातें निखर रही थी
कहां ये आंखों में चुभते से उजाले दर दर में हो रहा है

कहां गयी अब वो सौंधी खुश्बू ये नफरतों सा निकल रहा है
मुहब्बतों के फसल उगाए थे शूल बनकर चुभो रहा है

रहा वो माजी में खोए हर पल सुहाने दिन थे सुहानी राते
पुराने लोगों को है खबर अब वो मोल माटी के खो रहा है

ये बात शहरो में है मिली पर हमारे तहज़ीब ये नही है
अभी वो माटी की सौंधी खुश्बू से मन प्रफुल्लित हो रहा है

नसीब इन बिजलियों की देखो लिबास है कांच के बदन पर
हवा से पानी से लड़ के दीपक वजूद अपना ये ढो रहा है

शहर है रोशन मगर वो बस्ती में तो उजाला हुआ नही है
खयाल तक ये नही किसी को पड़ोस चुल्हा क्यूँ रो रहा है

खड़ा है सरहद पे लाल तेरा ए भारती मां तू फिक्र मत कर
इसी वजह से तो मुल्क मेरा बेफिक्र होकर के सो रहा है

सुना है अब के भी आ न पाया जो सरहदों पे गया है बेटा
लगी है आंखें कभी से दर पर के सब्र भी अब तो खो रहा है

Thursday, 1 November 2018

जुगनूओ से अंधेरों को मिटाने वाले

जुगनूओ  से   अंधेरों  को  मिटाने  वाले
है  कहां  आज  भला  बात  बनाने वाले

क्या  भला  साथ  निभाएंगे भुलाने वाले
राह में  छोड़ के  जाएंगे  वो  जाने वाले

लद गए दिन वो वफाओ के निभाने वाले
अब कहाँ मिलते हैं वो शख्स पुराने वाले

रात  भर  राह में  बैठे  थे  चरागां  करके
पर  खबर ही  न लगी कौन थे आने वाले

ये  हवाओं  में  अभी  गर्द नजर  आती है
क्या  शहर  छोड़  चुके  शोर  मचाने वाले

इक दिया  रोज  मुंडेरों पे  जला करता था
जाने  क्या  बल्ब से घर अपने सजाने वाले

ईंट  गारो  से  भला  कौन  यहां  मिलता है
घर  में  रिश्ते  है  जरा  खास  पुराने  वाले

सो गए सुनते ही फटकार फकत गुरबत के
तिफ्ल  ने   देखे   नही  लाड़ लड़ाने  वाले

अब  परिंदे  भी   वहां  आने  से कतराते हैं
ताक  में   रहते  सदा   जाल बिछाने  वाले

शाख पे चांद वो अटका जो जरा पल पर को
थाम  कर   बैठ  गए  दिल  ये  जमाने  वाले

रात  बैठी    है   इंतजार   सहर   का  करते
रह  गए   जाने  कहाँ   रात  को  लाने  वाले

जो  यहां   बोते   मुहब्बत   थे  उगाते  खुश्बू
अब  नजर  आते  न  वो   अम्न  जगाने वाले

रूठ  तो  जाए  मगर  आज  ये  डर लगता है
अब  नही  रहते   यहां  कल  से  मनाने  वाले

अब के  त्योहार  में  बच्चों  को  नये  कपडे़ दूं
सोंचते   रह     ये  गये    रोज   कमाने  वाले

जगमगाते    हुए    दीयों से    शहर   रौशन है
देख  पाए    न    तले     दीप     जलाने वाले

कैसे   मै   भेज दूँ   दुख्तर को   यूं  तन्हा तन्हा
चार  कांधे   भी   न    डोली  के   उठाने  वाले

आस   रहती  है   जईफी  मे   जरा   मीठे  की
बोल   कड़वे  ही मिले   दिल को   दुखाने  वाले

खूब   मायूस  से   दिखते  हैं   यहाँ   सब  चेहरे
है   नदारद   ये   शहर   से   ही   हंसाने   वाले

Monday, 29 October 2018

सोंचकर सुकून था की जल्द ही घर आ गया


सोंचकर  सुकून था  की  जल्द ही घर आ गया
चलते चलते  रास्ते में  क्यूँ  ये  पत्थर  आ गया

दायरों  में  सिमटी  सी  ही  खयालें  सब मिली
तजकिरे में  बात ये  सब भी  उभरकर आ गया

जो परिंदा  छोड़कर  शब आशियां था चल दिया
वो सहर होते ही फिर से आज छत पर आ गया

सो रहा था  चांद  थक कर  खूब भागमभाग से
आंखें मलते  वो उठा  जो सुब्ह अख्तर आ गया

मुल्क  में  मेरे  खुदाओं  की  लगी  है  बाढ़ सी
आज तो  हर मोड़  पर ही  एक रहबर आ गया

है  सियासत  के  लिए  मुद्दा  फकत  दैरो हरम
फैसले  से आज  के ये  भी निकलकर आ गया

हादसों  के  दरमियाँ  इक  हादसा  ये भी हुआ
मन के भीतर आपके जो था वो बाहर आ गया

हुक्मरां था  मुब्तिला  इस  मुल्क  के  मेयार में
फिर कहां से  राह में  छप्पर ही छप्पर आ गया

मुल्क में  खुश्बू के  सौदागर  थे उनके वल्दीयत
आज क्यूँ बच्चों के हाथों  उनके पत्थर आ गया

सब फिजाओं  में जहर  सा बो रहे हैं आजकल
मुल्क में  कैसा  फकत  ये  दौरे मंजर  आ गया

Saturday, 27 October 2018

गुजारे वक्त के जलते हुए शरारे थे

गुजारे   वक्त  के   जलते   हुए  शरारे थे
खयाल  आज   जहन  में   बहुत  सारे थे

जरूरतों  ने  परेशान  जब  किया  हमको
सुकून  छोड़  के  राहों में  शब  गुजारे थे

मिजाज सब के बदल जाते हैं घड़ी भर में
बदलते  वो भी  दिखे हैं जो कल हमारे थे

तमाम रात  पिघलता रहा वो जल जल के
फना  ये चांद  के  होने के  सब  इशारे थे

जला के ख्वाब  चरागां किया है घर उसने
वो  कह  रहा है  फकत  राएगा खसारे थे

न बरगला उन्हें  सूरज  निकल के आएगा
जो  तिरगी में  अभी  जूगनू  के  सहारे थे

मुंडेर पे भी कभी  इक दिया तो रख देखो
उम्मीद  पे  ही  कई  रातें  कल  गुजारे थे

तुम्हारे  साथ  जो  बीती वो जिंदगी सी थी
तुम्हारे  बाद   तो  बस  जिंदगी  गुजारे थे

करार  आए  अगर  देख  ले तुझे पल भर
यही  खयाल   लिए   दर ब दर  बिचारे थे

Wednesday, 24 October 2018

चल रही है अजब सी हवा आजकल

212 212 212 212

चल रही है अजब सी हवा आजकल
हो गयी  बे असर सी दुआ आजकल

घर के आंगन से बूढा शजर जो गया
चुभने  सी   लगी है शुआ आजकल

हसरतें  हैं    सुलगती  रही  उम्र भर
है  जरूरी   तकाजे   जरा आजकल

खत्म  होता  नही  जिंदगी का सफर
आदमी  बस मुसाफत रहा आजकल

वक्त के साथ  भर तो  गये जख्म पर
दिखता है   सदा  दाग सा  आजकल

रस्म सी  रह   गई है   खुशियाँ सभी
अब न  बाहम  रहा  राब्ता आजकल

दरमियां घर के  दीवार  की जो खड़ी
अब है भाई  पडोसी  नया आजकल

माँ ने दी सीख   रोटी के  बंटवारे की
बांट बेटों ने  मां को  दिया आजकल

आईना  कल  दिखाया  उसे  वक्त ने
है वो उलझा हुआ सा जरा आजकल

आस जिनसे थी कल रहबरी की हमें
बन के बैठे हैं  वो तो खुदा आजकल

भूख   रोटी    पे   चर्चे  चुनावों में है
है यहाँ फिर ये मसला खड़ा आजकल

है  फसादों  की जड़ में  ये  दैरो हरम
आदमियत   न   मुद्दा  रहा आजकल

Monday, 22 October 2018

खुलने लगी जुबां तो लगा जात का पता

खुलने लगी  जबां  तो लगा जात का पता
जाहिर  नकाब  कैसे हो जज्बात का पता

लहजा मिजाज  नाज नजरिया बदल गया
उनको  हुआ  हमारे  जो औकात का पता

लगती है सिसकियाँ  उसे शहनाई की तरह
अहमक बताए क्या भला  नग्मात का पता

किसने  चलाई  रस्म  ये  सौगात  की यहां
डरता  गरीब  सुन के  मुलाकात  का पता

गर्दिश  में हैं  सितारे  सभी  अपने वक्त के
तारों  के डूबने   से   लगा   रात  का पता

खोया हुआ  निजाम  तो  अपने ही मौज में
उसको  नही है  मुल्क के खंडरात का पता

बहते नही है आंसू  भी आंखों से आजकल
अखबार  में   छपे  नही  हालात  का पता

कोशिश  बाद  आती है  अब याद भी तेरी
मुद्दत  हुई है   भूले   खयालात   का पता

रखकर तो देख जलता दीया इक मुंडेर पर
मत  पुछ   बारहा   तू  यहां  रात का पता

दैरो हरम  की  बात  न कर  हमसे जिंदगी
वाईज  हमी  से  पुछे  खराबात   का पता

रस्ता बदल के  जाने वो ठहरी कहां है अब
अरसा  हुआ  है  भूले  ये  निशात का पता

Wednesday, 17 October 2018

यूँ नाम जिंदगी का डुबाया न जाएगा


यूँ  नाम  जिंदगी  का  डुबाया  न जाएगा
हमसे  तो  मुलम्मा  ये निभाया न जाएगा

आदत  में है  शुमार  के  सजदा करे तेरा
इतने  सहज  ये शौक  भुलाया न जाएगा

करता है  वो सितम  तो बड़े शौक से करे
हमसे  मगर  कभी वो  सताया न जाएगा

तार्रुफ  तो   कमाल  का है  वाह जिंदगी
आज़ार    बेशुमार    सुनाया   न जाएगा

आयी है  आज  मां मेरी कन्या के रुप में
निश्छल छवि सहज ये भुलाया न जाएगा

सब ही  नकाब  पहने  हुए  हैं  जहान में
हमसे  ये  झूठ  बात  निभाया  न जाएगा

रुठी  रही है  उम्र  तलक  हमसे  जिंदगी
इतनी  सी बात  हमसे  मनाया न जाएगा

रहती है  तिरगी सी  वो बस्ती में हर घड़ी
भूले भी  शम्स से  वहां  जाया न जाएगा

मिजाज   पूछ   लेते हैं  वो  दूर  बैठकर
ऐसे तो  हमसे कुछ भी बताया न जाएगा

लहजा  बता रहा है  कि  मिजाज गर्म है
रूठे  सनम है  हमसे  मनाया  न जाएगा

बस्ती अदद वो जल गई तुम्हारे  फूंक से
चुल्हा  कोई   कहेंगे  जलाया न जाएगा

Tuesday, 16 October 2018

ख्वाब खुश्बू ये शफ़क़ शाम ये रंगत क्या है

ख्वाब खुश्बू ये शफ़क़ शाम ये रंगत क्या है
आपकी याद से बढ़कर के ये दौलत क्या है

रात भर   चांद  तेरी  राह   तका  करता है
जानता  ही  वो नही  और  कयामत क्या है

बेखबर  सजदे   इबादत  से रहे हम अक्सर
सर  झुकाते  हैं  तेरे दर पे  अकीदत क्या है

जूगनू  पाल    वो    मगरूर   हुए  जाते हैं
सोंचते  हैं  की  उजालों की  जरूरत क्या है

शम्स को  छूने  की  ख्वाहिश  की अंधेरों ने
अपनी हस्ती ही मिटा ली ये हिमाकत क्या है

है  ये   बस्ती में   हमारे  सब  मजहब वाले
हम  नही जानते साहब के ये नफरत क्या है

बह  रहा है   जो लहू  पांव से  चलते चलते
पुछियेगा  कि  उसे  भूख की कीमत क्या है

आदमी  शाम सहर  ख्वाब  संभाले  फिरता
नासमझ को न खबर है कि मुसीबत क्या है

हाँ  बरसती है  सदा  नूर सी  मां के दर पर
और दुनिया में बताओ कि ये दौलत क्या है

बेरिदा  शौक  कहीं  है   तो  कहीं  मजबूरी
कशमकस है ये बड़ी आज के चाहत क्या है

माँ  दुआओं  के गिरह  बांध  देती है हरदम
हम  नही जानते  की  और ये  नेमत क्या है

क्या पता  कौन सी  सीरत ने है भरमाया सा
सब के ही  हाथ में पत्थर है अदावत क्या है

वक्त  ठहरा सा  रहा है  कि वहाँ  अरसे तक
पुछता  है  इक   लम्हा  कि  नज़ारत क्या है

है  बिदाई  की  घड़ी  बाप के  छलके  आंसू
आज  पत्थर ने  ये पुछा  कि रवायत क्या है

सांस  की  डोर   बंधी  है  तेरे  निस्बत  मेरी
और  लाडो  मै  बताऊँ  क्या  कुरबत क्या है

Wednesday, 10 October 2018

फासले क्यूँ दरमियां पे हो गए


फासले   क्यूँ    दरमियां  पे  हो गए
हादसे  ही   बस   यहाँ  पे   हो गए

जिंदगी  शिद्दत  से   हमको  जी गई
सोंचते हैं   हम   कहां  के    हो गए

हम  तकाजों  के  रहे  बस  मुब्तिला
हसरतें   सब  ही   निहां  से  हो गए

राब्ता  भी  खूब  था  मतलब  तलक
अब  नही   दिखते  कहां के  हो गए

कल तलक इक घर बड़ा सा था वहां
टूकड़े  अब   उस  मकां  के  हो गए

बोलता  अब   है    नही  कोई  यहां
लोग   बस   अपनी  जुबां के हो गए

सर जमीं  से   बैर  था   उसका बड़ा
सुनते   हैं  वो   आसमाँ   के हो गए

ये   वसीयत  में  लिखा कर   लाए है
हम    फ़क़त   बारे गरां   के  हो गए

कहकहें   सब   खो   गए   हालात में
आखिरी   में  सब  फ़ुगां   के  हो गए

तकाजों - जरुरतों /मुब्तिला - ग्रस्त /राब्ता - लगाव/बारे गरां - मुश्किल जिम्मेदारी /फ़ुगां - दर्द भरी पुकार

अनसूनी दास्तान रहने दो

अनसूनी  दास्तान   रहने दो
क्या कहेगा  जहान रहने दो

है पशेमां सी  जिंदगी अपनी
मत उछालो  बयान  रहने दो

बंट चुकी है जमीं हमारी सब
अब जरा आसमान  रहने दो

रोज आती हैं मुश्किलें घर पे
बस जरा सा लुभान रहने दो

खूब परखा है जिंदगी ने हमे
और अब  इम्तेहान  रहने दो

बंट  गए हैं  तमाम  ही रिश्ते
अब ये खाली मकान रहने दो

क्यूँ  परिंदे  यहां  नही  आते
छत पे  इक मर्तबान रहने दो

मुल्क है ऊब सा गया साहब
नफरतों की  दुकान रहने दो

है  जरुरी  जरा सी  यादें भी
घर  पुराने   समान  रहने दो

दैर छोड़ो  हरम को जाने दो
बस ये भारत महान रहने दो