ख्वाब खुश्बू ये शफ़क़ शाम ये रंगत क्या है
आपकी याद से बढ़कर के ये दौलत क्या है
रात भर चांद तेरी राह तका करता है
जानता ही वो नही और कयामत क्या है
बेखबर सजदे इबादत से रहे हम अक्सर
सर झुकाते हैं तेरे दर पे अकीदत क्या है
जूगनू पाल वो मगरूर हुए जाते हैं
सोंचते हैं की उजालों की जरूरत क्या है
शम्स को छूने की ख्वाहिश की अंधेरों ने
अपनी हस्ती ही मिटा ली ये हिमाकत क्या है
है ये बस्ती में हमारे सब मजहब वाले
हम नही जानते साहब के ये नफरत क्या है
बह रहा है जो लहू पांव से चलते चलते
पुछियेगा कि उसे भूख की कीमत क्या है
आदमी शाम सहर ख्वाब संभाले फिरता
नासमझ को न खबर है कि मुसीबत क्या है
हाँ बरसती है सदा नूर सी मां के दर पर
और दुनिया में बताओ कि ये दौलत क्या है
बेरिदा शौक कहीं है तो कहीं मजबूरी
कशमकस है ये बड़ी आज के चाहत क्या है
माँ दुआओं के गिरह बांध देती है हरदम
हम नही जानते की और ये नेमत क्या है
क्या पता कौन सी सीरत ने है भरमाया सा
सब के ही हाथ में पत्थर है अदावत क्या है
वक्त ठहरा सा रहा है कि वहाँ अरसे तक
पुछता है इक लम्हा कि नज़ारत क्या है
है बिदाई की घड़ी बाप के छलके आंसू
आज पत्थर ने ये पुछा कि रवायत क्या है
सांस की डोर बंधी है तेरे निस्बत मेरी
और लाडो मै बताऊँ क्या कुरबत क्या है
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