Tuesday, 16 October 2018

ख्वाब खुश्बू ये शफ़क़ शाम ये रंगत क्या है

ख्वाब खुश्बू ये शफ़क़ शाम ये रंगत क्या है
आपकी याद से बढ़कर के ये दौलत क्या है

रात भर   चांद  तेरी  राह   तका  करता है
जानता  ही  वो नही  और  कयामत क्या है

बेखबर  सजदे   इबादत  से रहे हम अक्सर
सर  झुकाते  हैं  तेरे दर पे  अकीदत क्या है

जूगनू  पाल    वो    मगरूर   हुए  जाते हैं
सोंचते  हैं  की  उजालों की  जरूरत क्या है

शम्स को  छूने  की  ख्वाहिश  की अंधेरों ने
अपनी हस्ती ही मिटा ली ये हिमाकत क्या है

है  ये   बस्ती में   हमारे  सब  मजहब वाले
हम  नही जानते साहब के ये नफरत क्या है

बह  रहा है   जो लहू  पांव से  चलते चलते
पुछियेगा  कि  उसे  भूख की कीमत क्या है

आदमी  शाम सहर  ख्वाब  संभाले  फिरता
नासमझ को न खबर है कि मुसीबत क्या है

हाँ  बरसती है  सदा  नूर सी  मां के दर पर
और दुनिया में बताओ कि ये दौलत क्या है

बेरिदा  शौक  कहीं  है   तो  कहीं  मजबूरी
कशमकस है ये बड़ी आज के चाहत क्या है

माँ  दुआओं  के गिरह  बांध  देती है हरदम
हम  नही जानते  की  और ये  नेमत क्या है

क्या पता  कौन सी  सीरत ने है भरमाया सा
सब के ही  हाथ में पत्थर है अदावत क्या है

वक्त  ठहरा सा  रहा है  कि वहाँ  अरसे तक
पुछता  है  इक   लम्हा  कि  नज़ारत क्या है

है  बिदाई  की  घड़ी  बाप के  छलके  आंसू
आज  पत्थर ने  ये पुछा  कि रवायत क्या है

सांस  की  डोर   बंधी  है  तेरे  निस्बत  मेरी
और  लाडो  मै  बताऊँ  क्या  कुरबत क्या है

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