Saturday, 27 October 2018

गुजारे वक्त के जलते हुए शरारे थे

गुजारे   वक्त  के   जलते   हुए  शरारे थे
खयाल  आज   जहन  में   बहुत  सारे थे

जरूरतों  ने  परेशान  जब  किया  हमको
सुकून  छोड़  के  राहों में  शब  गुजारे थे

मिजाज सब के बदल जाते हैं घड़ी भर में
बदलते  वो भी  दिखे हैं जो कल हमारे थे

तमाम रात  पिघलता रहा वो जल जल के
फना  ये चांद  के  होने के  सब  इशारे थे

जला के ख्वाब  चरागां किया है घर उसने
वो  कह  रहा है  फकत  राएगा खसारे थे

न बरगला उन्हें  सूरज  निकल के आएगा
जो  तिरगी में  अभी  जूगनू  के  सहारे थे

मुंडेर पे भी कभी  इक दिया तो रख देखो
उम्मीद  पे  ही  कई  रातें  कल  गुजारे थे

तुम्हारे  साथ  जो  बीती वो जिंदगी सी थी
तुम्हारे  बाद   तो  बस  जिंदगी  गुजारे थे

करार  आए  अगर  देख  ले तुझे पल भर
यही  खयाल   लिए   दर ब दर  बिचारे थे

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