गुजारे वक्त के जलते हुए शरारे थे
खयाल आज जहन में बहुत सारे थे
जरूरतों ने परेशान जब किया हमको
सुकून छोड़ के राहों में शब गुजारे थे
मिजाज सब के बदल जाते हैं घड़ी भर में
बदलते वो भी दिखे हैं जो कल हमारे थे
तमाम रात पिघलता रहा वो जल जल के
फना ये चांद के होने के सब इशारे थे
जला के ख्वाब चरागां किया है घर उसने
वो कह रहा है फकत राएगा खसारे थे
न बरगला उन्हें सूरज निकल के आएगा
जो तिरगी में अभी जूगनू के सहारे थे
मुंडेर पे भी कभी इक दिया तो रख देखो
उम्मीद पे ही कई रातें कल गुजारे थे
तुम्हारे साथ जो बीती वो जिंदगी सी थी
तुम्हारे बाद तो बस जिंदगी गुजारे थे
करार आए अगर देख ले तुझे पल भर
यही खयाल लिए दर ब दर बिचारे थे
No comments:
Post a Comment