Monday, 1 October 2018

क्या क्या बताएं जीस्त में क्या फलसफा रहा

क्या क्या बताएं जीस्त में क्या फलसफा रहा
हर  मोड़  पर   ही  एक   नया  हादसा रहा

आहों में  जिंदगी  ये   बसर  हो  रही  यूँ ही
हसरत  दबी  रही   मै  जरुरत  ही  का रहा

तहज़ीब   की  दुकान   यहां   दिखती  नही
सर पर  किसी के आज  दुपट्टा  भी ना  रहा

घर था ये कल तलक जो बड़ा सा मकान है
दीवार   रह  गए हैं   फकत  घर  कहां रहा

सरकार   क्यूँ   इनाम में   दौलत  लूटाएगी
मुद्दे   भुनाने  है   क्यूँ कि   चुनाव  आ रहा

मालूम  ही   चला न   मेरा  जी  चला गया
बेचैन  सा    यहाँ से    वहाँ   भागता  रहा

तशरीफ  ला  रहे हैं  जिगर  थाम लो  जरा
महबूब   वो  मेरा  तो   तुनकबाज  सा रहा

शामिल  हैं  मेरा भी   लहू  इस  जमीन पर
यूँ ही  नही कहा  जो  इसे  हमने  मां  कहा

आदत   में है  शुमार   के  सजदा  करे तेरा
सुब्ह   ये काम   करके  बड़ा  चैन सा  रहा

बदला  हुआ है  दौर  है  सरकार भी अलग
दुश्मन संभल  ये वक्त न अब पहले सा रहा

हकदार   ही   बदल  गए   दहलीज़ लांघते
बेटी  पे  पहले  सा   वो   कहाँ  रुतबा रहा

रोया  है   खूब   बाप   बिदाई  के  वक्त में
टुकड़ा  जिगर से  आज निकाला है जा रहा

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