जिंदगी हर एक मंजर आखिरी
है यहां हर शख्स जोकर आखिरी
इक बड़े रंगमंच जैसी है दुनिया
खेल तो होता यहां हर आखिरी
जानते है सब मगर ना मानते
जिंदगी में है नही जर आखिरी
बारहा क्यूँ होते रहते हादसे
क्यूँ नही होता कभी डर आखिरी
हर समय दहशत में गुजरे जिंदगी
अब कि है लगता ये अक्सर आखिरी
कल सुहाना था यहां मंजर बड़ा
खुशबू का है कहां घर आखिरी
भटके क्यूं है नन्हे से बच्चे यहां
होंगे कब हाथों के पत्थर आखिरी
क्यूँ परिंदे अब यहां आते नही
याद आ जाता है नश्तर आखिरी
कर रहम बारिश अब मुफलिस पर
है यही बस एक चादर आखिरी
है सियासत को खबर क्या भुख की
उसने ही मारा है पत्थर आखिरी
और क्या अब रह गया है देखना
आ गया अब तो ये मशहर आखिरी
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