Monday, 8 October 2018

जिंदगी हर एक मंजर आखिरी

जिंदगी    हर एक    मंजर  आखिरी
है  यहां  हर  शख्स  जोकर आखिरी

इक  बड़े   रंगमंच   जैसी है  दुनिया
खेल तो   होता  यहां   हर  आखिरी

जानते है    सब   मगर   ना  मानते
जिंदगी  में  है  नही   जर   आखिरी

बारहा   क्यूँ    होते   रहते    हादसे
क्यूँ नही   होता  कभी  डर आखिरी

हर समय  दहशत  में  गुजरे  जिंदगी
अब कि है लगता ये अक्सर आखिरी

कल  सुहाना  था  यहां  मंजर  बड़ा
खुशबू  का  है   कहां  घर  आखिरी

भटके  क्यूं है   नन्हे से   बच्चे  यहां
होंगे कब  हाथों के   पत्थर आखिरी

क्यूँ  परिंदे   अब  यहां   आते  नही
याद आ  जाता है   नश्तर  आखिरी

कर रहम  बारिश अब  मुफलिस पर
है  यही  बस  एक  चादर  आखिरी

है सियासत को खबर क्या भुख की
उसने  ही  मारा है  पत्थर  आखिरी

और क्या  अब रह  गया है  देखना
आ गया अब तो ये मशहर आखिरी

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