फासले क्यूँ दरमियां पे हो गए
हादसे ही बस यहाँ पे हो गए
जिंदगी शिद्दत से हमको जी गई
सोंचते हैं हम कहां के हो गए
हम तकाजों के रहे बस मुब्तिला
हसरतें सब ही निहां से हो गए
राब्ता भी खूब था मतलब तलक
अब नही दिखते कहां के हो गए
कल तलक इक घर बड़ा सा था वहां
टूकड़े अब उस मकां के हो गए
बोलता अब है नही कोई यहां
लोग बस अपनी जुबां के हो गए
सर जमीं से बैर था उसका बड़ा
सुनते हैं वो आसमाँ के हो गए
ये वसीयत में लिखा कर लाए है
हम फ़क़त बारे गरां के हो गए
कहकहें सब खो गए हालात में
आखिरी में सब फ़ुगां के हो गए
तकाजों - जरुरतों /मुब्तिला - ग्रस्त /राब्ता - लगाव/बारे गरां - मुश्किल जिम्मेदारी /फ़ुगां - दर्द भरी पुकार
No comments:
Post a Comment