आ गया है सुब्ह फिर पन्ना नया अखबार का
तजकिरा दिखता नहीं फिर से यहां लाचार का
है सभी मशरुफ अपने ही मसलहत बाब में
कौन पुछेगा भला अब हाल भी बीमार का
है यहां सब ही परेशां कम नही है मुश्किलें
वक्त कैसे मिल रहा फिर भी उन्हें तकरार का
गुंगे बहरों की ये बस्ती है यहां खामोश सब
क्या भला फिर फर्क पड़ता दर्द का चीत्कार का
रख रहन सब खुशियों को जी रहे हैं जिंदगी
रंग जो सुरत में दिखता है वो है उधार का
हम वतन की राह में कुर्बान है दिल जान से
सामने से लड़ सके कूवत नही गद्दार का
झुकता है सर हमारा मां के कदमों मे सदा
कोई भी सानी नहीं है मां तुम्हारे प्यार का
हिंद की ये सर जमीं मौजूद सब मजहब यहां
मसअला दैरो हरम का है यहां बेकार का
बस सियासत ने बिगाड़ा है यहां माहौल सब
है फकत कुर्सी से मतलब रह गया सरकार का
No comments:
Post a Comment