Wednesday, 10 October 2018

अनसूनी दास्तान रहने दो

अनसूनी  दास्तान   रहने दो
क्या कहेगा  जहान रहने दो

है पशेमां सी  जिंदगी अपनी
मत उछालो  बयान  रहने दो

बंट चुकी है जमीं हमारी सब
अब जरा आसमान  रहने दो

रोज आती हैं मुश्किलें घर पे
बस जरा सा लुभान रहने दो

खूब परखा है जिंदगी ने हमे
और अब  इम्तेहान  रहने दो

बंट  गए हैं  तमाम  ही रिश्ते
अब ये खाली मकान रहने दो

क्यूँ  परिंदे  यहां  नही  आते
छत पे  इक मर्तबान रहने दो

मुल्क है ऊब सा गया साहब
नफरतों की  दुकान रहने दो

है  जरुरी  जरा सी  यादें भी
घर  पुराने   समान  रहने दो

दैर छोड़ो  हरम को जाने दो
बस ये भारत महान रहने दो

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