बताएं क्या तुम्हे ऐ जान कुछ भी
नही अपनी यहाँ पहचान कुछ भी
बड़ी खामोश सी है ये गुजरती
बची क्या जिंदगी में शान कुछ भी
तेरे वादे पे हम ठहरे हुए हैं
नही है शह्र का अहसान कुछ भी
तमाशे देख कर अब जिंदगी के
नही होते हैं हम हैरान कुछ भी
क़मर था आसमाँ में दाग जैसा
सहर बाकी न थी पहचान कुछ भी
खुले खत सी हमारी जिंदगी है
निहां इसमें नही नादान कुछ भी
ये बहरे और अंधों की बस्ती है
नही है सिसकियों का भान कुछ भी
सियासत भी बड़ी ही है अजब सी
न जाने कर दे कब ऐलान कुछ भी
सहज तो है नही ये जिंदगी भी
यहाँ इतना नही आसान कुछ भी
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