करार पाने को दर दर तलाश करता हूँ
कहां मिले मुझे रहबर तलाश करता हूँ
अजाब है तो जरा खूब ही मगर साहब
सुकून चैन के पल भर तलाश करता हूँ
करीब आने से ये जिंदगी लरजती हैं
दिदारे यार के मंजर तलाश करता हूँ
निगाहें फेर के वो हमसे आज कहता है
तुम्हारे जैसे ही अक्सर तलाश करता हूँ
कहां कहां मै बता ढुंढता फिरूं तुझको
इसी वजह से ये भीतर तलाश करता हूँ
बलाएं सर पे ये मंडराते रहते हैं अक्सर
फकत दुआ के मै लश्कर तलाश करता हूँ
जिधर नजर कर लो तिरगी सी फैली है
फकत उजाले को अख्तर तलाश करता हूँ
ये सर जमीं है हमारी ये मां के जैसी है
कि मगरिफत मै इसी दर तलाश करता हूँ
ये बरगला के गया कौन नौनिहालों को
उठाए क्यूँ है ये पत्थर तलाश करता हूँ
यहां पे दैर हरम की लड़ाई जारी है
किधर से आते ये नश्तर तलाश करता हूँ
नजर जमाए था जो हिंद की जमीं पर कल
कहाँ गया वो सिकंदर तलाश करता हूँ
बहाए खून जमाने में बेगुनाहों के
कहां से आए वो खंजर तलाश करता हूँ
कलम से लिख दे रोटी तो भूख मिट जाए
जहां में एक वो शायर तलाश करता हूँ
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