सोंचकर सुकून था की जल्द ही घर आ गया
चलते चलते रास्ते में क्यूँ ये पत्थर आ गया
दायरों में सिमटी सी ही खयालें सब मिली
तजकिरे में बात ये सब भी उभरकर आ गया
जो परिंदा छोड़कर शब आशियां था चल दिया
वो सहर होते ही फिर से आज छत पर आ गया
सो रहा था चांद थक कर खूब भागमभाग से
आंखें मलते वो उठा जो सुब्ह अख्तर आ गया
मुल्क में मेरे खुदाओं की लगी है बाढ़ सी
आज तो हर मोड़ पर ही एक रहबर आ गया
है सियासत के लिए मुद्दा फकत दैरो हरम
फैसले से आज के ये भी निकलकर आ गया
हादसों के दरमियाँ इक हादसा ये भी हुआ
मन के भीतर आपके जो था वो बाहर आ गया
हुक्मरां था मुब्तिला इस मुल्क के मेयार में
फिर कहां से राह में छप्पर ही छप्पर आ गया
मुल्क में खुश्बू के सौदागर थे उनके वल्दीयत
आज क्यूँ बच्चों के हाथों उनके पत्थर आ गया
सब फिजाओं में जहर सा बो रहे हैं आजकल
मुल्क में कैसा फकत ये दौरे मंजर आ गया