Monday, 29 October 2018

सोंचकर सुकून था की जल्द ही घर आ गया


सोंचकर  सुकून था  की  जल्द ही घर आ गया
चलते चलते  रास्ते में  क्यूँ  ये  पत्थर  आ गया

दायरों  में  सिमटी  सी  ही  खयालें  सब मिली
तजकिरे में  बात ये  सब भी  उभरकर आ गया

जो परिंदा  छोड़कर  शब आशियां था चल दिया
वो सहर होते ही फिर से आज छत पर आ गया

सो रहा था  चांद  थक कर  खूब भागमभाग से
आंखें मलते  वो उठा  जो सुब्ह अख्तर आ गया

मुल्क  में  मेरे  खुदाओं  की  लगी  है  बाढ़ सी
आज तो  हर मोड़  पर ही  एक रहबर आ गया

है  सियासत  के  लिए  मुद्दा  फकत  दैरो हरम
फैसले  से आज  के ये  भी निकलकर आ गया

हादसों  के  दरमियाँ  इक  हादसा  ये भी हुआ
मन के भीतर आपके जो था वो बाहर आ गया

हुक्मरां था  मुब्तिला  इस  मुल्क  के  मेयार में
फिर कहां से  राह में  छप्पर ही छप्पर आ गया

मुल्क में  खुश्बू के  सौदागर  थे उनके वल्दीयत
आज क्यूँ बच्चों के हाथों  उनके पत्थर आ गया

सब फिजाओं  में जहर  सा बो रहे हैं आजकल
मुल्क में  कैसा  फकत  ये  दौरे मंजर  आ गया

Saturday, 27 October 2018

गुजारे वक्त के जलते हुए शरारे थे

गुजारे   वक्त  के   जलते   हुए  शरारे थे
खयाल  आज   जहन  में   बहुत  सारे थे

जरूरतों  ने  परेशान  जब  किया  हमको
सुकून  छोड़  के  राहों में  शब  गुजारे थे

मिजाज सब के बदल जाते हैं घड़ी भर में
बदलते  वो भी  दिखे हैं जो कल हमारे थे

तमाम रात  पिघलता रहा वो जल जल के
फना  ये चांद  के  होने के  सब  इशारे थे

जला के ख्वाब  चरागां किया है घर उसने
वो  कह  रहा है  फकत  राएगा खसारे थे

न बरगला उन्हें  सूरज  निकल के आएगा
जो  तिरगी में  अभी  जूगनू  के  सहारे थे

मुंडेर पे भी कभी  इक दिया तो रख देखो
उम्मीद  पे  ही  कई  रातें  कल  गुजारे थे

तुम्हारे  साथ  जो  बीती वो जिंदगी सी थी
तुम्हारे  बाद   तो  बस  जिंदगी  गुजारे थे

करार  आए  अगर  देख  ले तुझे पल भर
यही  खयाल   लिए   दर ब दर  बिचारे थे

Wednesday, 24 October 2018

चल रही है अजब सी हवा आजकल

212 212 212 212

चल रही है अजब सी हवा आजकल
हो गयी  बे असर सी दुआ आजकल

घर के आंगन से बूढा शजर जो गया
चुभने  सी   लगी है शुआ आजकल

हसरतें  हैं    सुलगती  रही  उम्र भर
है  जरूरी   तकाजे   जरा आजकल

खत्म  होता  नही  जिंदगी का सफर
आदमी  बस मुसाफत रहा आजकल

वक्त के साथ  भर तो  गये जख्म पर
दिखता है   सदा  दाग सा  आजकल

रस्म सी  रह   गई है   खुशियाँ सभी
अब न  बाहम  रहा  राब्ता आजकल

दरमियां घर के  दीवार  की जो खड़ी
अब है भाई  पडोसी  नया आजकल

माँ ने दी सीख   रोटी के  बंटवारे की
बांट बेटों ने  मां को  दिया आजकल

आईना  कल  दिखाया  उसे  वक्त ने
है वो उलझा हुआ सा जरा आजकल

आस जिनसे थी कल रहबरी की हमें
बन के बैठे हैं  वो तो खुदा आजकल

भूख   रोटी    पे   चर्चे  चुनावों में है
है यहाँ फिर ये मसला खड़ा आजकल

है  फसादों  की जड़ में  ये  दैरो हरम
आदमियत   न   मुद्दा  रहा आजकल

Monday, 22 October 2018

खुलने लगी जुबां तो लगा जात का पता

खुलने लगी  जबां  तो लगा जात का पता
जाहिर  नकाब  कैसे हो जज्बात का पता

लहजा मिजाज  नाज नजरिया बदल गया
उनको  हुआ  हमारे  जो औकात का पता

लगती है सिसकियाँ  उसे शहनाई की तरह
अहमक बताए क्या भला  नग्मात का पता

किसने  चलाई  रस्म  ये  सौगात  की यहां
डरता  गरीब  सुन के  मुलाकात  का पता

गर्दिश  में हैं  सितारे  सभी  अपने वक्त के
तारों  के डूबने   से   लगा   रात  का पता

खोया हुआ  निजाम  तो  अपने ही मौज में
उसको  नही है  मुल्क के खंडरात का पता

बहते नही है आंसू  भी आंखों से आजकल
अखबार  में   छपे  नही  हालात  का पता

कोशिश  बाद  आती है  अब याद भी तेरी
मुद्दत  हुई है   भूले   खयालात   का पता

रखकर तो देख जलता दीया इक मुंडेर पर
मत  पुछ   बारहा   तू  यहां  रात का पता

दैरो हरम  की  बात  न कर  हमसे जिंदगी
वाईज  हमी  से  पुछे  खराबात   का पता

रस्ता बदल के  जाने वो ठहरी कहां है अब
अरसा  हुआ  है  भूले  ये  निशात का पता

Wednesday, 17 October 2018

यूँ नाम जिंदगी का डुबाया न जाएगा


यूँ  नाम  जिंदगी  का  डुबाया  न जाएगा
हमसे  तो  मुलम्मा  ये निभाया न जाएगा

आदत  में है  शुमार  के  सजदा करे तेरा
इतने  सहज  ये शौक  भुलाया न जाएगा

करता है  वो सितम  तो बड़े शौक से करे
हमसे  मगर  कभी वो  सताया न जाएगा

तार्रुफ  तो   कमाल  का है  वाह जिंदगी
आज़ार    बेशुमार    सुनाया   न जाएगा

आयी है  आज  मां मेरी कन्या के रुप में
निश्छल छवि सहज ये भुलाया न जाएगा

सब ही  नकाब  पहने  हुए  हैं  जहान में
हमसे  ये  झूठ  बात  निभाया  न जाएगा

रुठी  रही है  उम्र  तलक  हमसे  जिंदगी
इतनी  सी बात  हमसे  मनाया न जाएगा

रहती है  तिरगी सी  वो बस्ती में हर घड़ी
भूले भी  शम्स से  वहां  जाया न जाएगा

मिजाज   पूछ   लेते हैं  वो  दूर  बैठकर
ऐसे तो  हमसे कुछ भी बताया न जाएगा

लहजा  बता रहा है  कि  मिजाज गर्म है
रूठे  सनम है  हमसे  मनाया  न जाएगा

बस्ती अदद वो जल गई तुम्हारे  फूंक से
चुल्हा  कोई   कहेंगे  जलाया न जाएगा

Tuesday, 16 October 2018

ख्वाब खुश्बू ये शफ़क़ शाम ये रंगत क्या है

ख्वाब खुश्बू ये शफ़क़ शाम ये रंगत क्या है
आपकी याद से बढ़कर के ये दौलत क्या है

रात भर   चांद  तेरी  राह   तका  करता है
जानता  ही  वो नही  और  कयामत क्या है

बेखबर  सजदे   इबादत  से रहे हम अक्सर
सर  झुकाते  हैं  तेरे दर पे  अकीदत क्या है

जूगनू  पाल    वो    मगरूर   हुए  जाते हैं
सोंचते  हैं  की  उजालों की  जरूरत क्या है

शम्स को  छूने  की  ख्वाहिश  की अंधेरों ने
अपनी हस्ती ही मिटा ली ये हिमाकत क्या है

है  ये   बस्ती में   हमारे  सब  मजहब वाले
हम  नही जानते साहब के ये नफरत क्या है

बह  रहा है   जो लहू  पांव से  चलते चलते
पुछियेगा  कि  उसे  भूख की कीमत क्या है

आदमी  शाम सहर  ख्वाब  संभाले  फिरता
नासमझ को न खबर है कि मुसीबत क्या है

हाँ  बरसती है  सदा  नूर सी  मां के दर पर
और दुनिया में बताओ कि ये दौलत क्या है

बेरिदा  शौक  कहीं  है   तो  कहीं  मजबूरी
कशमकस है ये बड़ी आज के चाहत क्या है

माँ  दुआओं  के गिरह  बांध  देती है हरदम
हम  नही जानते  की  और ये  नेमत क्या है

क्या पता  कौन सी  सीरत ने है भरमाया सा
सब के ही  हाथ में पत्थर है अदावत क्या है

वक्त  ठहरा सा  रहा है  कि वहाँ  अरसे तक
पुछता  है  इक   लम्हा  कि  नज़ारत क्या है

है  बिदाई  की  घड़ी  बाप के  छलके  आंसू
आज  पत्थर ने  ये पुछा  कि रवायत क्या है

सांस  की  डोर   बंधी  है  तेरे  निस्बत  मेरी
और  लाडो  मै  बताऊँ  क्या  कुरबत क्या है

Wednesday, 10 October 2018

फासले क्यूँ दरमियां पे हो गए


फासले   क्यूँ    दरमियां  पे  हो गए
हादसे  ही   बस   यहाँ  पे   हो गए

जिंदगी  शिद्दत  से   हमको  जी गई
सोंचते हैं   हम   कहां  के    हो गए

हम  तकाजों  के  रहे  बस  मुब्तिला
हसरतें   सब  ही   निहां  से  हो गए

राब्ता  भी  खूब  था  मतलब  तलक
अब  नही   दिखते  कहां के  हो गए

कल तलक इक घर बड़ा सा था वहां
टूकड़े  अब   उस  मकां  के  हो गए

बोलता  अब   है    नही  कोई  यहां
लोग   बस   अपनी  जुबां के हो गए

सर जमीं  से   बैर  था   उसका बड़ा
सुनते   हैं  वो   आसमाँ   के हो गए

ये   वसीयत  में  लिखा कर   लाए है
हम    फ़क़त   बारे गरां   के  हो गए

कहकहें   सब   खो   गए   हालात में
आखिरी   में  सब  फ़ुगां   के  हो गए

तकाजों - जरुरतों /मुब्तिला - ग्रस्त /राब्ता - लगाव/बारे गरां - मुश्किल जिम्मेदारी /फ़ुगां - दर्द भरी पुकार

अनसूनी दास्तान रहने दो

अनसूनी  दास्तान   रहने दो
क्या कहेगा  जहान रहने दो

है पशेमां सी  जिंदगी अपनी
मत उछालो  बयान  रहने दो

बंट चुकी है जमीं हमारी सब
अब जरा आसमान  रहने दो

रोज आती हैं मुश्किलें घर पे
बस जरा सा लुभान रहने दो

खूब परखा है जिंदगी ने हमे
और अब  इम्तेहान  रहने दो

बंट  गए हैं  तमाम  ही रिश्ते
अब ये खाली मकान रहने दो

क्यूँ  परिंदे  यहां  नही  आते
छत पे  इक मर्तबान रहने दो

मुल्क है ऊब सा गया साहब
नफरतों की  दुकान रहने दो

है  जरुरी  जरा सी  यादें भी
घर  पुराने   समान  रहने दो

दैर छोड़ो  हरम को जाने दो
बस ये भारत महान रहने दो

Monday, 8 October 2018

आ गया है सुब्ह फिर पन्ना नया अखबार का

आ गया है  सुब्ह फिर  पन्ना नया अखबार का
तजकिरा दिखता नहीं फिर से यहां लाचार का

है सभी  मशरुफ  अपने ही   मसलहत बाब में
कौन पुछेगा  भला  अब   हाल भी  बीमार का

है यहां  सब ही   परेशां  कम नही है  मुश्किलें
वक्त कैसे  मिल रहा  फिर भी उन्हें तकरार का

गुंगे  बहरों   की ये बस्ती  है यहां  खामोश सब
क्या भला फिर फर्क पड़ता दर्द का चीत्कार का

रख  रहन सब  खुशियों को  जी रहे हैं  जिंदगी
रंग  जो  सुरत में  दिखता  है  वो है  उधार का

हम  वतन की  राह में  कुर्बान है  दिल जान से
सामने  से   लड़ सके   कूवत   नही  गद्दार का

झुकता है   सर  हमारा  मां के  कदमों  मे सदा
कोई  भी   सानी नहीं है  मां  तुम्हारे  प्यार का

हिंद की ये  सर जमीं  मौजूद  सब मजहब यहां
मसअला   दैरो हरम  का   है  यहां  बेकार का

बस  सियासत ने  बिगाड़ा है  यहां  माहौल सब
है फकत  कुर्सी से मतलब रह गया सरकार का

जिंदगी में ये अलग सा हादसा रह जाएगा

जिंदगी में  ये  अलग सा   हादसा  रह जाएगा
आप से  मिलना  हमारा  ख्वाब सा रह जाएगा

सांस भी  चुभने  लगी है  धड़कनों के दरमियां
क्या पता कब तक खुदाया मुब्तिला रह जाएगा

राह तकते  थक गई  आंखें तो  आंसू चल पड़े
ढुंढने को  आपको  अब क्या बता  रह जाएगा

सुर्खियां  बनने लगी है  आजकल तो  फब्तियां
कोई अब  किरदार कैसे  पाकिजा  रह जाएगा

आज के  अखबार में है  ये छपी  ताजा खबर
आदमियत  अब शहर में  नाम का रह जाएगा

या हरम   औ  दैर के  आगे न   कोई  बात है
ये सबब  सब फितने है  सब धरा  रह जाएगा

हुक्मरां को फिक्र क्या  रोटी नही तो क्या हुआ
सुर्खियों में  कल  यही  मुद्दा  नया  रह जाएगा

अब किसी से मिलना हो तो संभल कर मिलना
कोई गैरा  क्या पता कल  काबीना  रह जाएगा

थक गया  सूरज बिचारा  तो उफ़क के घर चला
डूब कर  सूरज मरा तो  बस शफ़क़ रह जाएगा

जिंदगी हर एक मंजर आखिरी

जिंदगी    हर एक    मंजर  आखिरी
है  यहां  हर  शख्स  जोकर आखिरी

इक  बड़े   रंगमंच   जैसी है  दुनिया
खेल तो   होता  यहां   हर  आखिरी

जानते है    सब   मगर   ना  मानते
जिंदगी  में  है  नही   जर   आखिरी

बारहा   क्यूँ    होते   रहते    हादसे
क्यूँ नही   होता  कभी  डर आखिरी

हर समय  दहशत  में  गुजरे  जिंदगी
अब कि है लगता ये अक्सर आखिरी

कल  सुहाना  था  यहां  मंजर  बड़ा
खुशबू  का  है   कहां  घर  आखिरी

भटके  क्यूं है   नन्हे से   बच्चे  यहां
होंगे कब  हाथों के   पत्थर आखिरी

क्यूँ  परिंदे   अब  यहां   आते  नही
याद आ  जाता है   नश्तर  आखिरी

कर रहम  बारिश अब  मुफलिस पर
है  यही  बस  एक  चादर  आखिरी

है सियासत को खबर क्या भुख की
उसने  ही  मारा है  पत्थर  आखिरी

और क्या  अब रह  गया है  देखना
आ गया अब तो ये मशहर आखिरी

Sunday, 7 October 2018

बताएं क्या तुम्हे ऐ जान कुछ भी

बताएं क्या तुम्हे  ऐ जान कुछ भी
नही अपनी यहाँ पहचान कुछ भी

बड़ी  खामोश  सी  है  ये गुजरती
बची क्या जिंदगी में शान कुछ भी

तेरे   वादे पे   हम   ठहरे  हुए हैं
नही है शह्र का  अहसान कुछ भी

तमाशे  देख कर  अब  जिंदगी के
नही  होते हैं  हम  हैरान कुछ भी

क़मर था   आसमाँ में  दाग  जैसा
सहर बाकी न थी पहचान कुछ भी

खुले   खत  सी  हमारी  जिंदगी है
निहां  इसमें  नही  नादान कुछ भी

ये  बहरे  और  अंधों  की  बस्ती है
नही है सिसकियों का भान कुछ भी

सियासत  भी बड़ी ही  है अजब सी
न जाने कर दे  कब ऐलान कुछ भी

सहज  तो है  नही   ये  जिंदगी भी
यहाँ  इतना नही  आसान  कुछ भी

करार पाने को दर दर तलाश करता हूँ

करार  पाने को  दर दर  तलाश  करता हूँ
कहां  मिले  मुझे  रहबर  तलाश करता हूँ

अजाब  है तो जरा  खूब ही  मगर  साहब
सुकून  चैन के  पल भर  तलाश करता हूँ

करीब   आने से   ये जिंदगी   लरजती हैं
दिदारे   यार के   मंजर   तलाश करता हूँ

निगाहें  फेर के  वो हमसे आज  कहता है
तुम्हारे  जैसे ही  अक्सर  तलाश करता हूँ

कहां कहां  मै बता  ढुंढता  फिरूं  तुझको
इसी  वजह से  ये भीतर  तलाश करता हूँ

बलाएं  सर पे ये  मंडराते  रहते हैं अक्सर
फकत दुआ के मै लश्कर तलाश करता हूँ

जिधर  नजर कर लो  तिरगी सी  फैली है
फकत उजाले को अख्तर तलाश करता हूँ

ये  सर जमीं है  हमारी  ये मां के जैसी है
कि मगरिफत मै इसी दर तलाश करता हूँ

ये  बरगला के  गया  कौन  नौनिहालों को
उठाए  क्यूँ है ये   पत्थर  तलाश करता हूँ

यहां  पे   दैर हरम   की   लड़ाई  जारी है
किधर से  आते ये नश्तर  तलाश करता हूँ

नजर जमाए था जो हिंद की जमीं पर कल
कहाँ  गया  वो  सिकंदर  तलाश  करता हूँ

बहाए    खून    जमाने   में    बेगुनाहों के
कहां से  आए वो  खंजर  तलाश करता हूँ

कलम से लिख दे  रोटी तो भूख मिट जाए
जहां  में  एक वो  शायर  तलाश  करता हूँ

Monday, 1 October 2018

क्या क्या बताएं जीस्त में क्या फलसफा रहा

क्या क्या बताएं जीस्त में क्या फलसफा रहा
हर  मोड़  पर   ही  एक   नया  हादसा रहा

आहों में  जिंदगी  ये   बसर  हो  रही  यूँ ही
हसरत  दबी  रही   मै  जरुरत  ही  का रहा

तहज़ीब   की  दुकान   यहां   दिखती  नही
सर पर  किसी के आज  दुपट्टा  भी ना  रहा

घर था ये कल तलक जो बड़ा सा मकान है
दीवार   रह  गए हैं   फकत  घर  कहां रहा

सरकार   क्यूँ   इनाम में   दौलत  लूटाएगी
मुद्दे   भुनाने  है   क्यूँ कि   चुनाव  आ रहा

मालूम  ही   चला न   मेरा  जी  चला गया
बेचैन  सा    यहाँ से    वहाँ   भागता  रहा

तशरीफ  ला  रहे हैं  जिगर  थाम लो  जरा
महबूब   वो  मेरा  तो   तुनकबाज  सा रहा

शामिल  हैं  मेरा भी   लहू  इस  जमीन पर
यूँ ही  नही कहा  जो  इसे  हमने  मां  कहा

आदत   में है  शुमार   के  सजदा  करे तेरा
सुब्ह   ये काम   करके  बड़ा  चैन सा  रहा

बदला  हुआ है  दौर  है  सरकार भी अलग
दुश्मन संभल  ये वक्त न अब पहले सा रहा

हकदार   ही   बदल  गए   दहलीज़ लांघते
बेटी  पे  पहले  सा   वो   कहाँ  रुतबा रहा

रोया  है   खूब   बाप   बिदाई  के  वक्त में
टुकड़ा  जिगर से  आज निकाला है जा रहा