Thursday, 20 August 2015

मसला जिंदगी का कभी हल नहीं होता

मसला जिंदगी का कभी हल नही होता
कही आंखे नही होती कही काजल नही होता

वो पेशानी की सलवटे याद है मुझे
उस मुंतजिर का कभी कल नही होता

नौनिहाल भुल गये माटी मे खेलना
नये दौर की ममता का आंचल नही होता

जानवर सारे शहर में आ गए
सुनते है कि अब कही जंगल नही होता

इश्क मुहब्बत बीते जमाने की बात है
अब कोई मजनू कही पागल नही होता

Wednesday, 19 August 2015

नजरे भीग जाती है अखबार देखकर

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नजरे भीग जाती है अखबार देखकर
खबरे आ रही है अब बाजार देख कर

घर के कोने मे पडी़ चाकी खामोश है
खाली कनस्तर रो रहे त्योहार देखकर

माटी के चुल्हे ने अवकाश ले लिया
बदले हुए समय की सरकार देख कर

हरा भरा आंगन वो बच्चो का शोर
सारा आलम खामोश है दीवार देख कर

मैंने रिश्ते संभाले मोतियों की तरह
उन्होंने प्यार निभाया इश्तेहार देख कर

सब बदल जाते हैं जमाने के साथ
दिल भर आता है माँ का दुलार देख कर

Wednesday, 12 August 2015

माँ का पल्लू

माँ का पल्लू...भीगा भीगा लगता है...
यकीनन आंखे...बरसी होंगी रात भर...

Monday, 10 August 2015

जिंदगी किस्तों में है

जिंदगी किस्तो मे है
या कस्ती मे

कुछ
पता नही चलता

वक्त की लहरो मे
हिचकोले खाते
हुए

बस
गुजर रही है

Saturday, 8 August 2015

क्यूँ कि मेरे देश में लोकतंत्र है

झुठ खिलखिला रहा
सत्य मौन है

क्यूँ कि मेरे देश में
लोकतंत्र है

गलत को गलत कहना
भी यहा गलत है

क्यूँ कि मेरे देश में
लोकतंत्र है

देश तोड रहे है
अभिव्यक्ति के नाम पर

क्यूँ कि मेरे देश में
लोकतंत्र है

आजाद है गुनाहगार
निर्दोष बंद है

क्यूँ कि मेरे देश में
लोकतंत्र है

रोटी पर है बहस
मजहब बुलंद है

क्यूँ कि मेरे देश में
लोकतंत्र है

संसद है बंधक
जिम्मेदार चंद है

क्यूँ कि मेरे देश में
लोकतंत्र है

खबरे बिक रही है
चौक चौराहों पर

दाम लगा उठा लो
जो खबरे पसंद है

क्यूँ कि मेरे देश में
लोकतंत्र है