मसला जिंदगी का कभी हल नही होता
कही आंखे नही होती कही काजल नही होता
वो पेशानी की सलवटे याद है मुझे
उस मुंतजिर का कभी कल नही होता
नौनिहाल भुल गये माटी मे खेलना
नये दौर की ममता का आंचल नही होता
जानवर सारे शहर में आ गए
सुनते है कि अब कही जंगल नही होता
इश्क मुहब्बत बीते जमाने की बात है
अब कोई मजनू कही पागल नही होता
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