Thursday, 20 August 2015

मसला जिंदगी का कभी हल नहीं होता

मसला जिंदगी का कभी हल नही होता
कही आंखे नही होती कही काजल नही होता

वो पेशानी की सलवटे याद है मुझे
उस मुंतजिर का कभी कल नही होता

नौनिहाल भुल गये माटी मे खेलना
नये दौर की ममता का आंचल नही होता

जानवर सारे शहर में आ गए
सुनते है कि अब कही जंगल नही होता

इश्क मुहब्बत बीते जमाने की बात है
अब कोई मजनू कही पागल नही होता

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