Wednesday, 19 August 2015

नजरे भीग जाती है अखबार देखकर

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नजरे भीग जाती है अखबार देखकर
खबरे आ रही है अब बाजार देख कर

घर के कोने मे पडी़ चाकी खामोश है
खाली कनस्तर रो रहे त्योहार देखकर

माटी के चुल्हे ने अवकाश ले लिया
बदले हुए समय की सरकार देख कर

हरा भरा आंगन वो बच्चो का शोर
सारा आलम खामोश है दीवार देख कर

मैंने रिश्ते संभाले मोतियों की तरह
उन्होंने प्यार निभाया इश्तेहार देख कर

सब बदल जाते हैं जमाने के साथ
दिल भर आता है माँ का दुलार देख कर

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