Friday, 15 May 2020

एक दिन का ये कोई किस्सा नही

एक  दिन  का   ये  कोई   किस्सा  नही
पर    कहानी    में    मेरा    चर्चा    नही

मै   ही   हूँ   बुनियाद   हर   तामीर  की
पर   हूँ   मै   मुद्दा   कोई   मसला   नही

कोई   गुंजाइश   नहीं   फिर  भी   मगर 
आस  का   दरिया  कभी   सुखता  नही

खो  गये   तुम  ही   जहाँ  की   भीड़  में
मैने   तो    अपना   पता    बदला   नही

क्या  पता  क्या  सोच कर मै आज तक 
फोन  से    नंबर    मिटा    पाया    नही

अब  झिझकता   हूँ   गुजरते   मैं  उधर
रहगुज़र   वो   अब   मेरा   सपना  नही

आ  ही   जाते  हो   खयालो   जहन में
बख्श  दो  अब  ये  सितम  अच्छा नही

जिंदगी  है     बे  बहर      बे  काफिया
जिसका अपना इक अदद मिसरा नही

और    कितने    दर्द    है    पहलू   तेरे
तू  बता     ऐ  जिंदगी     शरमा    नही

किस्तों   में   क्यूँ   मारती   है  रोज  ही
ये   तरीका     जिंदगी    अच्छा    नही

है  बड़े  महफूज़   खासम  खास   सब
पर  भरोसा   बस   पियादो   का   नही

आंख में कोई सुखद मंजर सलामत है कहाँ

आंख  में  कोई  सुखद   मंजर   सलामत  है कहाँ
निकला है  तफरी पे महशर  दर सलामत है कहाँ

सर पे  हालातों की गठरी   पहलू में  थामे है कल
इस  भयावह  दौर  में   ईश्वर  सलामत  है   कहाँ

है  अभी   मुझमे  कहीं   बाकी  जरा सी  जिंदगी
सांस  लेने   को  मगर   पिंजर  सलामत  है कहाँ

यूँ  हुए   ऐलान   फिर  से   हैं   वजीफे  मुल्क में
इन  वजीफो   में  मेरा   छप्पर  सलामत है कहाँ

जिंदगी में  इन  दिनों  फुर्सत  बड़ी  है  चल  रही
फुरसतों  के  दौर  में  अब  जर सलामत है कहाँ

ढूंढती  है  मुंह  छिपाने   की  जगह   मजबूरियाँ
हादसों  की   जद से  कोई  दर सलामत है कहाँ

ढूंढते   हो    जिंदगानी    मौत   के    बाजार  में
शहर  क्या  कोई  मुहल्ला  घर सलामत है कहाँ

आबरू  की   छोड़िए   है  जान आफत में पड़ी
गिर  पड़े   दस्तार  सारे   सर  सलामत  हैं कहाँ

इस  तरक्की   वास्ते   क्या क्या चुकाए मोल हैं
गांव  छूटा   खेत  छूटे   घर  सलामत   है  कहाँ

कुछ शिकस्ता मन  दरीदा जिस्म मायूस हसरतें
लौट  तो  आए  हैं लेकिन  दर सलामत है कहाँ

वो भुखे की रोटी का किस्सा कहाँ है

122 122 122 122 
वो  भुखे  को  रोटी का  किस्सा कहाँ है 
तसल्ली    भरोसा    नया  सा   कहाँ है

ये  बांटे हैं  तुमने  जो   राहत के पैकेज
जरा  इनमे  कह   मेरा  हिस्सा  कहाँ है

कहाँ  है  कुछ उम्मीद  की कोई किरणें
कहीं     मेरे   बारे  में     चर्चा   कहाँ है

तेरी   फिक्र  में  हुक्मरां  कुछ  बता तो
मेरे  जैसा  मध्यम  सा  तबका  कहाँ है

सवर्णों  का  तमगा  लिए  फिर  रहा मैं
किसी  के लिए  पर  ये  मसला कहाँ है

कहीं   छूट   कर  में   कहीं सब्सिडी है
मगर   मेरे   खातिर  भी  सोचा कहाँ है

मेरे   घर  भी  चूल्हा  जला कब नही है
किसी  ने भी  आकर के  देखा  कहाँ है

हर इक  वर्ग  की  फिक्र की आपने पर
मेरी   की  हो  परवाह   ऐसा   कहाँ  है

वो बनिया है ब्राम्हण है ठाकुर हैं सिंधी
नजर में  किसी के भी  पिछड़ा कहाँ है

सभी  की  तरह  है   मेरी  भी   कहानी
किसी  से  अलग  मेरा  दुखड़ा कहाँ है

मेरी भी  हो सकती है  मजबूरियाँ कुछ
कोई  भी   मगर  ये   समझता  कहाँ है

हमेशा   बड़ा   आदमी    बस   बताया
कभी   खोखला   घर   टटोला  कहाँ है

मेरी   भी   रही   खाशियत  ये  सदा से
बड़ी  मुश्किलों  में   जी   रोया  कहाँ है

यूँ आंकड़ों से भूख भगायी न जायेगी

221 2121 1221 212 
यूँ   आंकड़ों  से   भूख  भगायी   न   जायेगी
रोटी    तसल्लियों   से   जुटायी   न   जायेगी

देखे   सुनहरे   ख्वाब   है   ता जिंदगी   बहुत 
ख्वाबों  से  अब  ये  आग  बुझायी न जायेगी

बैठे   हुए  हैं   घर  पे  ही   दो  माह   हो  गये
इस  तरह   उम्र   और   बितायी   न  जायेगी

कबतक दिलासे खुद को दें सब ठीक ठाक है
अब  असलियत  से  आंख चुरायी न जायेगी

क्या कह रहे हो  दिल पे  लगाना  न बात को
कुछ  बातें   उम्र भर  ही  भुलायी  न जायेगी

लहजा  मिजाज   नाज   नजरिया  बकायदा
बरसों  जहन  से  तल्खी  मिटायी  न जायेगी

लफ्फाजियों  का  दौर है  इक और भी  सही
पर  यूँ   फजीहतें   तो   करायी    न जायेगी

कहने  को  कह गया  है  वो मै हूँ न साथियों
उस  पर  यकीं  की  राह  बनायी  न जायेगी

कुछ कर गुजरने वास्ते  कुछ कर गुजर जरा
बातों  से   जिंदगी   तो   सजायी  न जायेगी

मंहगे   बहुत  है   ख्वाब  तसल्ली  सुकून के
लत  ये  फिजूल खर्ची   लगायी  न  जायेगी

धोखा  फरेब  झूठ   अलग  बात   है  मियां
सच  की  बिना  पे  लूट  मचायी  न जायेगी

हर  मोड़  पे  है  मुंतजिर  इक  हादसा नया
यूँ  हादसों  पे  खुशियां  मनायी  न  जायेगी

दौरे हालात है यही मैंने



दौरे    हालात      है     यही     मैंने 
नींद   में    की    है    शायरी    मैंने

जिंदगी    खैर    मांगती   है   मियां
इस  कदर    जी   है   जिंदगी   मैंने

तुमसे मिलकर ही खुद को जाना है
तुमसे     सीखी   है    दोस्ती    मैंने

एक    अहसान    बस    तुम्हारा है
तुमसे    पायी    है  हर  खुशी  मैंने

देख   पाया   नही   मै   दुनिया को
सिर्फ    देखी    है      बेबसी    मैंने

इक  समंदर  भी  कम  पड़े  शायद
पाल    रख्खी    है    तीश्नगी   मैंने

शुक्रिया    चांद   का  भी  करना है 
चांद   से    ली  है     रोशनी    मैंने

तसव्वुर में था घर खीसे में रोटी

तसव्वुर  में था  घर खीसे में रोटी
मेरे  सीने   से    गुजरी   रेलगाड़ी

मै था  मजबूर थी  तकदीर खोटी
मेरे  सीने   से   गुजरी    रेलगाड़ी

पड़ी है पटरियों पर  बिखरी बोटी
मेरे  सीने   से   गुजरी    रेलगाड़ी

सफर लंबा हुआ मंजिल थी छोटी
मेरे    सीने  से   गुजरी   रेलगाड़ी

न  मेरे  नाम  पर  यूँ   फेक  गोटी
मेरे   सीने  से    गुजरी   रेलगाड़ी 

सियासत  बख्श  दे  मेरी  लंगोटी
मेरे  सीने   से    गुजरी   रेलगाड़ी 

न हो ये ख्वाब  काटो तो किचोटी
मेरे  सीने  से     गुजरी   रेलगाड़ी

दरमियाँ यूँ भी हादसा गुजरा

दरमियाँ    यूँ   भी   हादसा   गुजरा
फिर कहाँ कुछ भी ख्वाब सा गुजरा

दिल  को  तेरी  तलब  ही  ऐसी  थी
आखिरी    हश्र     इब्तिदा    गुजरा

सुर्खियां   बनती    बेबसी   अब  तो
फब्तियों    में   ही   तब्सिरा  गुजरा

मुश्किलों   में   यूँ   जिंदगी   गुजरी
इक  गया   फिर  ये   दुसरा  गुजरा

आरज़ू     जिनसे     रहनुमाई   थी
वो   मेरा    वक्त   मौन  सा  गुजरा

हौसले     ओढते      बिछाते    हुए
सर्दियों  का    जो  दौर  था  गुजरा

आस  बन  के  ही  रह गई  दुनिया
दौर   अच्छा    भी   राएगा  गुजरा

हसरतें    शामियाना       ढुंढती  है
चाह   अक्सर    ही   बेरिदा गुजरा

कर लो फिर से आयोजित कुछ शोक सभाएं

कर लो फिर से आयोजित कुछ शोक सभाएं
भेंट चढ़ी  फिर   नियति  के   कुछ   विपदाएं

मातम   पसरा     चीख    रही  है     मजबूरी
किस  पर  दोष  मढ़े  सोच   ये मन मिचलाए

विचलित  है  मन से  व्यथित  हैं  जन मानस
पर  आक्रोश   न   उपजे    देख  ये  घटनाएं

मुंह  ताकते    पड़ी   रोटियाँ    बिखरी   सब
जिनकी  खातिर  उसने  तन अपने  कटवाए

इंतजार  ही  करते  रह  गये   सब  मुसाफिर
मौत बनी रेल उन्हें रौंदती  निकली फिर हाए

क्या   करे    मजदूर   थे    जाहिल    बिचारे
गांव   जो  अपना   छोडकर   परदेश   आए

भूख  ने   मजबूर  उनको   कर   दिया   जो
आज   के    हालात    ऐसे   बन   है   आए

खयाल बन के जुबां से निकलता रहता हूँ

खयाल  बन  के  जुबां  से  निकलता  रहता हूँ
मै  एक  सोच  हूँ   बस   साथ-साथ  चलता हूँ

बहुत  खराब  सी  आदत  है  मुझमें एक जरा
मैं   वक्त   देख  के    रिश्ते   नही   बदलता हूँ

सहज  भुला   नही  पाता  थपेड़े  वक्त  के  मैं 
भूला  दूं   बात  मगर   लहजा  याद  रखता हूँ

उदास  करके  मुझे  वो  भी  खुश  नही रहता
ये  सोंच सोंच  मैं  हर  पल  मचलता  रहता हूँ

वबा  के  पहले   कहीं  भूख  से  न  मर  जाएं
खयाल  आते  ही  मै  यक ब यक  सिहरता हूँ

नसीब  की  जो  हो  मर्ज़ी दिखाए खेल अपने 
बस उसके तौर ही अब आजकल मैं चलता हूँ

कभी   चराग   के  नीचे  भी   देख  लेते  जरा
मैं   जिंदगी   का  अंधेरा   वही   पे   पलता हूँ

नयी  नयी  है  अमीरी   शगल  नया  है  अभी
बताते   यार   है  कीमत   मैं   मौन   रहता  हूँ

वो  सांस सांस  में  खुश्बू  की तरह शामिल हैं
मै  पागलो  की  तरह  दर  ब  दर  भटकता हूँ

खुदा  ने  दिल को  नवाजा तो था मुहब्बत से
कहाँ  से  नफरतें  भर  आयी  सोच  डरता हूँ

दौरे हाल देख कर सिहर गया है आदमी

दौरे  हाल   देख कर   सिहर  गया  है  आदमी
हादसे  कदम  कदम  पे   डर  गया है  आदमी

पी  गया है  बेचकर  अनाज  घर के  आज वो
नीचता  की  हद  तलक  उतर गया है  आदमी

बेहिसी  गली गली  हैं  शहर  शहर  इस  कदर
बेचकर   जमीर  अपने   मर  गया  है  आदमी

बस  तलाशता  है  मौके  कर गुजरने  को नया
कौन  कह रहा  कि अब  सुधर गया है आदमी

हौसले  न   पस्त  है   अभी  थका   नही  जरा
बस  जरा  सी  देर  को  ठहर  गया है  आदमी

गल्तियों से  तौबा  कर रहा  हमल में था मियां 
अपनी  बात  से  मगर  मुकर  गया है  आदमी

हर कदम पे  धोखे  और  हर कदम पे  चोट है
दर्द  और   दर्द  से  ही   भर  गया  है  आदमी

आपदा में  भी  कहाँ  है  बाज  आ  रहा  कोई
कारनामें  फिर  नया  सा  कर गया है  आदमी

भाषणों  से  राशनों  की  कर   रहा है  पूर्तियाँ
लेख  जोख  में  सदा  सिफर  गया  है आदमी

वक्त के  बदलते  ही  बदल  गये  सब आशना
अपनो में बन अजनबी  बिखर गया है आदमी

शोर  है  जरूरतों  के  चाहतों  की   कश्मकश
इस  उधेड बुन  में अब किधर गया है आदमी

मंदिरों  में   मस्जिदों  में   ताले  है   लटक रहे
रब से मिलने  मयकशी के घर गया है आदमी

आने फिर लगे रूझान मयकदा जो खुल गया
मुद्दतों  के  बाद  फिर  से  तर  गया है आदमी

सिसकती बस्तियां घर बार देखने के लिए

सिसकती  बस्तियां  घर बार  देखने के लिए 
कोई  नही   है   ये   चीत्कार  देखने के लिए

तबाहियों   के   ये   मंजर   डराते   है  बेहद
क्यूँ  मुब्तिला  है  ये  सरकार देखने के लिए

बहुत  शरीफ  हैं  संगत  भलो  की करता है
वबा   गया  नही  मयख्वार  देखने  के लिए

न  जीते जी तो अयादत कभी किया साहब
वो  बन  गये अभी  हकदार  देखने के लिए

अदू   हमारा   है    उद्दंड    खूब   शातिर  है
वो  इज्तिराब  है   यलगार  देखने  के  लिए

बहुत   करीब  से   गुजरे   हमारी  बस्ती  से 
मगर  न  आए  वो  बीमार  देखने  के  लिए

है  चीख  राएगा  बहरो  के  शहर  में  लोगों
न  आएगा  कोई  भी  यार  देखने  के  लिए

सुखनवरो  के  दिलों को खंगाला जब हमने
कुछ अधजले मिले अशआर देखने के लिए

बला   का   दर्द    उढ़ेला  है   गज्ल गोई  में
कि कौन कितना है गमख्वार देखने के लिए

कभी  जो  जिंदगी  की  धूप  ने सताया मुझे
निकल  पड़ा  मैं  भी  खुद्दार  देखने के लिए

जमात   जात   है   पर  आदमी   नदारद  है
कहाँ  को  जाए  भला  प्यार  देखने के लिए

न मंदिर न मस्जिद के ही वलवले पर

न मंदिर  न मस्जिद  के ही वलवले पर
मिला  रब  न  हमको  किसी  रास्ते पर

ऐ  वाईज  चलो  मयकदे   ढूंढ ले  अब 
सुना है कि मिलता है  सब इस पते पर

किसे  होश  में  रब  मिला है  कभी भी
जो  बेहोश था  रब दिखा  बस उसे पर

यूँ  पसरी  है  खामोशियां  हर तरफ ही 
लगी   जैसे     पाबंदियां    बोलने   पर

लगी  चीखने  दर  दिवारें  भी  अब  तो
है   शर्तें   यहां   लागू  मुंह  खोलने  पर

कहीं   भीड़ में   खो  गया  यार  अपना
मिले  अब  कहाँ  देखे किस मरहले पर 

लिये  हाथ   खंजर  फिरे  है   यहाँ  सब
मिले  लोग  जितने  गजब  ही मिले पर

भला  क्या  नया कुछ दिखायेगा ये अब
मचलने  लगा  क्यूँ है  दिल  आईने  पर

हवाएं  भी  बदली सी है  शहर की कुछ
अदब  तौर   तहजीब   है   हाशिये  पर

ये  इंसानियत  हर कदम ही है लज्जित 
पशेमां   नही    कोई   अपने  किये  पर

तड़पता  रहा  जब तलक जिस्म घायल
बने   खूब   विडियो    वहां  हादसे  पर

बहुत  सोच कर  ही कदम कुछ उठाओ
नजर  हैं   कोई   तेरे   हर   फैसले   पर

सलीका   हमे   अब   सिखाने  चला  है
न अफसोस जिसको है अपने किये पर

मुसलसल दूरियाँ अच्छी नही है

मुसलसल    दूरियाँ     अच्छी  नही है
जो   हैं     मजबूरियाँ   अच्छी  नही है

जरूरी     फासले   हो     दरमियाँ पर
ये   दिल   के   दरमियाँ अच्छी नही है

दिलों  में    गर   खरासे   रह    गयी है
तो   फिर   वो   यारियाँ  अच्छी नही है

वो  माँ   लज्जो   हया   न    देखती है
नजर  बद    उरियाँ    अच्छी    नही है

कभी  कर  लो   पडोसी  से  भी  चर्चा
बगल  में    सिसकियाँ   अच्छी नही है

कभी  तो   हाथ   कांधो पर भी रख्खो
सदा   ही    तालियाँ    अच्छी   नही है

पशेमां        हो   रही  है    आदमीयत 
वो  हो   अब   सुर्खियाँ  अच्छी नही है

है चर्चा     बेबसी  का    हर कदम पर
फिर   उसपे   फब्तियाँ  अच्छी नही है

बिलखती   जिंदगी   भूखी      मिलेगी
यहाँ पर     लोरियाँ    अच्छी    नही है

है    समझौते    जरूरी    जिंदगी    में
मुसलसल   खामियाँ   अच्छी   नही है

मुहब्बत  है   बहुत    वाजिब   जरुरत
दिलों  में   तल्ख़ियाँ   अच्छी   नही  है

किसी का दिल दुखा कर मत मजे लो
अब  ऐसी   मस्तियाँ   अच्छी   नही है

है नुमायाँ अब तो हर गम क्या करे

है नुमायाँ  अब तो  हर गम  क्या  करे
इस बिना पर  आंखे पुरनम  क्या करे

यूँ  चुभे    नश्तर   जिगर  में    बारहा 
अब कोई हाकिम या मरहम क्या करे

दफ्न  कितनी  ही   कहानी  हो  गयी
सो  गयी   आंखे   मुकद्दम  क्या  करे

है  तसल्ली    और   दिलासा   राएगा
दर्द  अपना  हो  तो  महरम  क्या करे

इस  अदा से  कह  गया वो  अलविदा
ऐसे  जिंदादिल  का  मातम  क्या करे

जब   लगेगी    आग    उट्ठेगा    धुआँ
चुभती  आंखों  पे  आलम  क्या  करे

जिंदगी  के   नाम  पर   धोखा   हुआ
इस  जरा  सी  बात का  गम क्या करे

रोज  ही  है   इक  तमाशा  जा ब जा 
रोज  इनका   खैर मक्दम   क्या  करे

कर लिया  अगवा  किसी  ने शर्म को
खो गया  कमबख्त यकदम क्या करे

ढूंढ    लेती    है     बहाने    सुर्खियाँ
फिर गिला शिकवा यूँ पैहम क्या करे

उम्र भर   किरदार  बदलते   हम  रहे 
खत्म  किस्सा हो गया  हम क्या करे

याद  ने    तेरी  भिगोया    इस  कदर
बारिशों  का  कोई  मौसम  क्या  करे

इश्तेहारों  में       भली  है     जिंदगी
पर  हकीकत  में  है  बेदम  क्या करे

कदम कदम पे तीश्नगी कदम कदम पे सिसकियाँ

कदम कदम पे तीश्नगी कदम कदम पे सिसकियाँ
है   कागजों  पे   राहतें    है   टेबलों  पे   अर्जियाँ

कदम कदम  पे  मुश्किलें  कदम कदम चुनौतियाँ
उठे   जरा सी   गल्तियों पे  यार हजार  उंगलियाँ

अंधेरी   बस्तियों  को   इंतेजार   है    उजाले  का
पर आफताब  की  अभी तो  चल  रही हैं छुट्टियाँ

अभी     जरा  सी    देर   है    पहुंचने  में    राहतें
सियासतें   पहुंच   गई  हैं   हादसों   तलक  मियां

हर इक शख़्स  वक्त का  गुलाम  ही तो  है जनाब
चली है कब  जहान में  किसी के मन की मर्जियाँ

बेचारगी  को   बेबसी  को   बेचते   खबर  नवीस
है  पेपरों  में  आजकल   यही  बनी  है   सुर्खियाँ

छिपी है ना उम्मीदी में भी इक किरण उम्मीद की
यकीन  है  निकल  ही  आयेंगी  कहीं से रश्मियाँ

है  उम्र भर के    तर्जुबो  की   हासिली  लकीरें यें 
यूँ  ही तो  आ गई  नही है  चेहरे  पर  ये   झुर्रियां

कहां  गयी   मुहब्बतों  की   वो   अजीम   दास्तां
क्यूँ फासले से रह गये हैं  अब दिलों के  दरमियाँ

दिखा है  फिर से  बरहना सा  चांद  आज राह में
किसी की बेबसी बनी  फिर आज देखो फब्तियाँ

क्यूँ  आ गये  ये दश्त के  रिहायशी  यूँ शहर अब
कि  मांगने  लगी  है खैर  अब  तमाम  तितलियाँ

होशियारी भी दिखाना चाहिए

होशियारी   भी     दिखाना   चाहिए
दौर    जैसा    पेश   आना   चाहिए
 
करने  लगता  है   जमाना  इस्तेमाल
कुछ  तो  लहजा  शातिराना  चाहिए

तालियों  से   पेट   तो   भरता   नही
पेट  खातिर   आबो   दाना    चाहिए

अर्जियों  से  काम  अब  चलता नही
सोये  सिस्टम  को   जगाना   चाहिए

ताब  कम  है  मुफलिसों  के  शोर में
चीखने  का  फन  भी  आना चाहिए

कुछ  इतर  कर  नफरतों  के  दौर में
दिल से  दिल  रस्ता  बनाना  चाहिए

रंजो गम   सबसे  छिपा करके मियां 
हंस के  मुश्किल को लजाना चाहिए

दर ब दर  रोने से क्या  हासिल भला
खूब   हंसना  और   हंसाना  चाहिए

अपनी   नाकामी   छिपाने  के  लिए
जिम्मेदारी    को    बहाना    चाहिए

मुफ्त  है    बदनाम    कोरोना   यहां
दोष  सिस्टम  पर  भी आना चाहिए

फासलों  के    फैसले  सब    तेरे  थे
वक्त  पर    इल्ज़ाम   आना  चाहिए 

कल न थी मरने तलक फुर्सत जिन्हें
आज   जीने   का   बहाना   चाहिए

शहर के शहर का यूँ खौफ़ जदा हो जाना

शहर  के  शहर  का  यूँ   खौफ़ जदा  हो  जाना
सिम्त   जहरीले   बला    बादे सबा    हो  जाना

ये   मुसलसल   सी  रवायत  नही  हो सकती है 
है  ये  कुदरत  का ख़लक़ से ही खफ़ा हो जाना

मौत  मंडराने  लगी  जह्न  में  महशर  की  तरह
है  सबब  आदमी  का  सब से  जुदा  हो  जाना

सांस  की   तर्ह   धड़कता   जो   रहा   सीने  में
देता  है  इंतेहां  तकलीफ़  है  का  था  हो जाना

जह्न  में  मुद्दतों  छिप कर   है   कसकता  रहता 
दिल से निस्बत का  यकायक ही जुदा हो जाना

लोहे  पत्थर  को  न गारे को  बदलने की है लत
चाह है  छत  की  मगर  आसमां  सा  हो  जाना

याद रहता न  सितमगर को  सितम करना मगर 
शौक  है   जख्म  का   मेरे  ही   हरा  हो  जाना

दर्द मंदो  की  जरूरत  की  दवा  बन लो  कभी
सिसकियों   के  भी   मददगार  जरा  हो  जाना

तीरगी  बस्तियों  में  रोशनी   दरकार  है   बहुत 
आदमी   पहले   बनो   बाद   खुदा   हो  जाना

माहे  रमज़ान में  सीरत का  नियत का  सबका 
खल का मुमकिन है  अब इंसान जरा हो जाना

खूब  आसां है  किसी  पर  भी  उठाना  उंगली 
पर है मुश्किल किसी बिगड़े का खरा हो जाना 

रात का  दिन में  बदलना है  सहल  बात मियां
पर न  मुमकिन  है  नजरिए का नया हो जाना

ये दर्दे मुहब्बत के मानी न पुछो

ये  दर्दे  मुहब्बत  के   मानी  न पुछो
यूँ  बर्बादियों  की   कहानी   न पुछो

जला अपना घर हमने की रोशनी है
अब  हमसे   पसे तर्जुमानी  न पुछो

गुजर हो रही सिसकियों दरमियाँ ही
है  कहते  किसे  शादमानी  न  पुछो

उजालों  की राहें  है  तकता बिचारा
उदासी   अंधेरों   जुबानी   न   पुछो

शिकायत अदावत  मजम्मत बड़ी है
कदम दर कदम की निशानी न पुछो 

मिले दर्द  आंसू  ही  बस  जिंदगी में 
है  भरपूर  आफात   हानि  न  पुछो

वहीं  बेहिसी  है   कहाँ  है नया कुछ
पलायन  प्रथा   है   पुरानी  न  पुछो 
 
न  झकझोर  पाए  ये सोते बशर को 
कलम  में  लहू  है  कि पानी न पुछो

है  जद्दोजहद  कश्मकश  से भरी  ये
अब  हमसे  खबर जिंदगानी न पुछो

खिले फूल  हर रंग  गुलशन में देखो
अब  हमसे  हरा  जाफरानी  न पुछो

हर इक कौम  के लोग  रहते यहां हैं
यूँ  हमसे  लहू की  निशानी  न पुछो

दरमियाँ क्यूँ फकत फासला रह गया

दरमियाँ  क्यूँ  फकत  फासला  रह गया
क्या  रहा  रब्त कल आज क्या रह गया

अब  वो लम्हें   हंसी  सब  कहाँ गुम हुए
हर  कदम    हादसा    हादसा  रह  गया

ख्वाब   में  भी   मुझे   देखता   वो  नही
जिसको   ता उम्र   मै   देखता  रह  गया

इक  नमी सी  है  दीवारों  में  अब तलक
रात भर   कौन   रोता   भला   रह  गया

दर्द  अपना   किसे  हम   सुनाते    भला 
साथ  हमारे   फकत   आईना  रह  गया

ख्वाहिशों  हसरतों  की   गुथी  गांठ  सी
हर  मजा   मौज  सारा   धरा   रह  गया

जिंदगी    बोनसाई    के    जैसी    लगी
जो  भी  देखा  वो  बस  देखता रह गया

दिल की  दहलीज़ पे  जब चरागां किया
जल  गये   तेल  बाती   दिया  रह  गया

फिक्र मंजिल की थी ना  सफर कोई था
वो भी क्या दिन रहे आज क्या रह गया

कुछ न सुनता कोई कुछ न कहता कोई
शहर  ये  गूंगे  बहरों  ही  का  रह  गया

दर ब दर   ढूंढते   हम   जमीं   आसमां 
पर  न  जाने  कहाँ  वो  खुदा  रह  गया

खुश  हैं  हम  देख  वीरां  सा  दैरो हरम
आज  मुझसा  ही  तन्हा  खुदा रह गया

देख कर    चार   कांधे    कहा   मुर्दे  ने
जीते  जी  लापता  क्यूँ  भला  रह गया

जो  सबक  कल किताबों में हमने पढ़ा
वो  असल  जिंदगी  में   धरा  रह  गया

लूटने  वाले   अपने  ही   है   मुल्क  में
गैर का  ख्वाब  बस ख्वाब सा रह गया

मौत  सिरहाने   रख  सो  रहे  हैं  सभी
जिंदगी  का  यही  फलसफा  रह गया

मुसलसल जिंदगी दुश्मन नही है

मुसलसल   जिंदगी   दुश्मन   नही है
किसी  भी   तर्ह  की  अनबन नही है

बड़ी   जद्दोजहद   हर   मोड़   पर है 
मगर फिर भी कुछ अपनापन नही है

यकीं   कैसे  करें   हर   आदमी   पर
हर इक   किरदार  तो  कुंदन  नही है

गुजर  ही   जाएगा  ये  वक्त  भी  पर
कोई  इस  तर्ह   चंचल  मन   नही  है

बहुत  मातम  को  रोया  हमने है  पर
कहीं   आंखों  में   गीलापन   नही है

बेतरतीब  जिंदगी  गुजरी  वो जिसमें
रदीफ़ो    काफिया    बंधन    नही है

सियासत  फिक्र  में  है  सब्र  कर  तू
हुआ  क्या  गर  अभी  राशन नही है

समझ  में   आते  हैं   सब  कारनामे
समझने  में   कोई   उलझन  नही है

परख  लेते  है  हर  किरदार  ही हम
हुआ  क्या  गर  कोई  दरपन नही है

लगा  चस्का   जरा   नामावरी   का
वगरना  कोई  भी  अड़चन  नही  है

बहुत  सन्नाटा  सा  पसरा  है  घर में
रसोई  में    कोई     बर्तन    नही  है

परिंदे  चल  पड़े   हिजरत  में   सारे
कि  सुखे  पेड़   पर   जीवन नही है

फटे  है    पैरहन    मेरे      यकीनन
मगर   दामन  में   मैलापन   नही है

शरारत  करना  अब  तो  छोड़ दे तू
मुकद्दर  मुझमे  अब  बचपन नही है

फुदकना बंद चिड़ियों का हुआ अब
किसी भी घर में अब आंगन नही है

रवायत   बस   निभाते   जा   रहे हैं
बदन  में  जान  है  धड़कन  नही है

हर इक रिश्ता सदा दिल से निभाया 
बस इक  मुझमे  सयानापन  नही है

फिर नयी सुबह का इमकान हुआ जाता है

फिर  नयी  सुबह का इमकान  हुआ जाता है
देखिए    आदमी    इंसान    हुआ    जाता है

चीर कर   अब्र   घनेरे   कैसे   निखरा  सूरज
रब  भी   ये  देख के   हैरान   हुआ  जाता है

अफरा-तफरी का है  बेसब्र सा मौसम आया
आज  हर शख़्स  ही  भगवान हुआ जाता है

जूझती  मौत  से  हर   रोज ही जाने कितनी
भूख  से  लड़ते  हुए   भान   हुआ   जाता है

देख  मुश्किल  घड़ी  इमदाद  नही करते जो 
उनसे  हर  शख़्स   पशेमान   हुआ  जाता है

हल्के-फुल्के  से  हंसी  लम्हें  जरुरी  हैं कुछ
आदमी   राएगा   हल्कान   हुआ    जाता है

उम्र  गुजरी  है  यूँ  ही  नापते   राहों  को  ही
दिल  भी  मंजिल  पे  परेशान हुआ जाता है

पेट खातिर जी जतन सारे किये हैं अब तक
जिस्म पर  ये भी  तो एहसान हुआ जाता है

मुस्कुराहट पे  लगी उठने क्यूँ उंगली सबकी
क्या किसी का भला नुकसान हुआ जाता है

रोजमर्रा  की   जरूरत  भी  सताने जो लगी
सांस के फूलने का  फिर भान हुआ जाता है

यूँ  ही   चुपचाप  रहे   बैठे   भला  कैसे  हम
दिल  ये  रह रह के  ही शैतान हुआ जाता है

भागती  दौड़ती   सड़कों  पे   क्यूँ  सन्नाटा है
चीखता  शहर   क्यूँ  श्मशान  हुआ जाता है

आदमी   जात   जमातों   में है  उलझा  ऐसे
पल में   गीता  और  कुरआन  हुआ जाता है

कैसा  ये वक्त   अचंभा  सा है  आया साहब
हादसा   रोज  का   मेहमान  हुआ  जाता है

आग   बस्ती में   लगा  पूछता है  कैसे हुआ
देखिए   कैसे   वो    नादान  हुआ  जाता है

क्यूँ  ये   बाजार   यूँ  वीरान  नजर  आते हैं
आदमी  खुद से ही  अनजान हुआ जाता है

कभी मुद्दा कभी मसला रहा हूँ

कभी   मुद्दा    कभी    मसला   रहा हूँ
मै   अपने   आप में     उलझा  रहा हूँ

रहा   अपने   ही   घर  मैं अजनबी सा
भरे    बाजार      मैं     तन्हा     रहा हूँ

कि मन  उकता  रहा   अब फुरसतों से
मै   खुद   की  सोच में   उलझा रहा हूँ

जरुरत   तो    मेरी   भी   थी   मगर मैं 
नुमाइश    से   डरा    सहमा     रहा हूँ

लड़े   हम    उम्र भर    दैरो हरम    को
किये  पर  अपने  अब  पछता   रहा हूँ

न  समझे   अहमियत   चारागरी  कल
जरूरत   सबको   अब  समझा रहा हूँ

फिरे  वो     बांटते    जुगनू     शहर में
अंधेरा  ढांप     मैं    अपना     रहा  हूँ

बदलता  रहता   जो   हालात   पर  है
बड़ा   ढुलमुल  नजरिया   सा   रहा हूँ

ब मुश्किल अस्ल गम पर  आए आंसू
बिना  मतलब    यूँ  ही   रोता   रहा हूँ

छिपा  वो  मेरे  ही  भीतर  था  लेकिन
मै   पागल   दर ब दर   होता   रहा  हूँ

न  दो   खैरात   तुम  जुगनू   मुझे  यूँ
अंधेरा   मैं     जरा     गहरा    रहा  हूँ

फिर अपना अपना हिस्सा ले गये सब
मै  इक   अखबार   का   पन्ना  रहा हूँ

खुले  हैं   कौन से   जख्मों  के   टांके
यूँ  हरदम   ही   रफू   करता  रहा  हूँ

मेरी   जद्दोजहद   खुद   आप  से  है
मै  खुद  ही  को  उधड़ सी ता रहा हूँ

अपनी ही ख्वाहिशों से है बेजार आदमी

अपनी  ही  ख्वाहिशों   से  है  बेजार आदमी 
खुद  के ही  घर में  जैसे हो अखबार आदमी

बंटता  रहा    जरूरतों    के   तौर    उम्र भर 
होकर  के   सफ्ह सफ्ह   वो  लाचार आदमी

बीतते    तमाम   वक्त   ही    रिश्ते    समेटते 
सबकी   निगाहों   में  है   गुनहगार   आदमी

रहता है अपनो बीच भी गुमसुम सा मौन सा 
तन्हाइयों  का   लगता  है   हकदार  आदमी

पल में  जरा  सी  बात  पे  बिखरा है  राएगा
बनता बिगड़ता  खुद से ही  लाचार  आदमी

उलझी  हुईं  हैं   जात  जमातों   में   जिंदगी 
उल्फत  के  बीच  बन  गया  दीवार  आदमी

भागे  फिरे  है   झूठ  के   पीछे   तमाम  उम्र 
भुला  सब अपने   रीत  वो संस्कार   आदमी

इस   चमचमाती   दौरे तरक्की   के  दरमियां 
बन कर  के   रह   गया है   इश्तेहार  आदमी