Friday, 15 May 2020

मुसलसल जिंदगी दुश्मन नही है

मुसलसल   जिंदगी   दुश्मन   नही है
किसी  भी   तर्ह  की  अनबन नही है

बड़ी   जद्दोजहद   हर   मोड़   पर है 
मगर फिर भी कुछ अपनापन नही है

यकीं   कैसे  करें   हर   आदमी   पर
हर इक   किरदार  तो  कुंदन  नही है

गुजर  ही   जाएगा  ये  वक्त  भी  पर
कोई  इस  तर्ह   चंचल  मन   नही  है

बहुत  मातम  को  रोया  हमने है  पर
कहीं   आंखों  में   गीलापन   नही है

बेतरतीब  जिंदगी  गुजरी  वो जिसमें
रदीफ़ो    काफिया    बंधन    नही है

सियासत  फिक्र  में  है  सब्र  कर  तू
हुआ  क्या  गर  अभी  राशन नही है

समझ  में   आते  हैं   सब  कारनामे
समझने  में   कोई   उलझन  नही है

परख  लेते  है  हर  किरदार  ही हम
हुआ  क्या  गर  कोई  दरपन नही है

लगा  चस्का   जरा   नामावरी   का
वगरना  कोई  भी  अड़चन  नही  है

बहुत  सन्नाटा  सा  पसरा  है  घर में
रसोई  में    कोई     बर्तन    नही  है

परिंदे  चल  पड़े   हिजरत  में   सारे
कि  सुखे  पेड़   पर   जीवन नही है

फटे  है    पैरहन    मेरे      यकीनन
मगर   दामन  में   मैलापन   नही है

शरारत  करना  अब  तो  छोड़ दे तू
मुकद्दर  मुझमे  अब  बचपन नही है

फुदकना बंद चिड़ियों का हुआ अब
किसी भी घर में अब आंगन नही है

रवायत   बस   निभाते   जा   रहे हैं
बदन  में  जान  है  धड़कन  नही है

हर इक रिश्ता सदा दिल से निभाया 
बस इक  मुझमे  सयानापन  नही है

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