मुसलसल जिंदगी दुश्मन नही है
किसी भी तर्ह की अनबन नही है
बड़ी जद्दोजहद हर मोड़ पर है
मगर फिर भी कुछ अपनापन नही है
यकीं कैसे करें हर आदमी पर
हर इक किरदार तो कुंदन नही है
गुजर ही जाएगा ये वक्त भी पर
कोई इस तर्ह चंचल मन नही है
बहुत मातम को रोया हमने है पर
कहीं आंखों में गीलापन नही है
बेतरतीब जिंदगी गुजरी वो जिसमें
रदीफ़ो काफिया बंधन नही है
सियासत फिक्र में है सब्र कर तू
हुआ क्या गर अभी राशन नही है
समझ में आते हैं सब कारनामे
समझने में कोई उलझन नही है
परख लेते है हर किरदार ही हम
हुआ क्या गर कोई दरपन नही है
लगा चस्का जरा नामावरी का
वगरना कोई भी अड़चन नही है
बहुत सन्नाटा सा पसरा है घर में
रसोई में कोई बर्तन नही है
परिंदे चल पड़े हिजरत में सारे
कि सुखे पेड़ पर जीवन नही है
फटे है पैरहन मेरे यकीनन
मगर दामन में मैलापन नही है
शरारत करना अब तो छोड़ दे तू
मुकद्दर मुझमे अब बचपन नही है
फुदकना बंद चिड़ियों का हुआ अब
किसी भी घर में अब आंगन नही है
रवायत बस निभाते जा रहे हैं
बदन में जान है धड़कन नही है
हर इक रिश्ता सदा दिल से निभाया
बस इक मुझमे सयानापन नही है
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