Friday, 15 May 2020

फिर नयी सुबह का इमकान हुआ जाता है

फिर  नयी  सुबह का इमकान  हुआ जाता है
देखिए    आदमी    इंसान    हुआ    जाता है

चीर कर   अब्र   घनेरे   कैसे   निखरा  सूरज
रब  भी   ये  देख के   हैरान   हुआ  जाता है

अफरा-तफरी का है  बेसब्र सा मौसम आया
आज  हर शख़्स  ही  भगवान हुआ जाता है

जूझती  मौत  से  हर   रोज ही जाने कितनी
भूख  से  लड़ते  हुए   भान   हुआ   जाता है

देख  मुश्किल  घड़ी  इमदाद  नही करते जो 
उनसे  हर  शख़्स   पशेमान   हुआ  जाता है

हल्के-फुल्के  से  हंसी  लम्हें  जरुरी  हैं कुछ
आदमी   राएगा   हल्कान   हुआ    जाता है

उम्र  गुजरी  है  यूँ  ही  नापते   राहों  को  ही
दिल  भी  मंजिल  पे  परेशान हुआ जाता है

पेट खातिर जी जतन सारे किये हैं अब तक
जिस्म पर  ये भी  तो एहसान हुआ जाता है

मुस्कुराहट पे  लगी उठने क्यूँ उंगली सबकी
क्या किसी का भला नुकसान हुआ जाता है

रोजमर्रा  की   जरूरत  भी  सताने जो लगी
सांस के फूलने का  फिर भान हुआ जाता है

यूँ  ही   चुपचाप  रहे   बैठे   भला  कैसे  हम
दिल  ये  रह रह के  ही शैतान हुआ जाता है

भागती  दौड़ती   सड़कों  पे   क्यूँ  सन्नाटा है
चीखता  शहर   क्यूँ  श्मशान  हुआ जाता है

आदमी   जात   जमातों   में है  उलझा  ऐसे
पल में   गीता  और  कुरआन  हुआ जाता है

कैसा  ये वक्त   अचंभा  सा है  आया साहब
हादसा   रोज  का   मेहमान  हुआ  जाता है

आग   बस्ती में   लगा  पूछता है  कैसे हुआ
देखिए   कैसे   वो    नादान  हुआ  जाता है

क्यूँ  ये   बाजार   यूँ  वीरान  नजर  आते हैं
आदमी  खुद से ही  अनजान हुआ जाता है

No comments:

Post a Comment