आंख में कोई सुखद मंजर सलामत है कहाँ
निकला है तफरी पे महशर दर सलामत है कहाँ
सर पे हालातों की गठरी पहलू में थामे है कल
इस भयावह दौर में ईश्वर सलामत है कहाँ
है अभी मुझमे कहीं बाकी जरा सी जिंदगी
सांस लेने को मगर पिंजर सलामत है कहाँ
यूँ हुए ऐलान फिर से हैं वजीफे मुल्क में
इन वजीफो में मेरा छप्पर सलामत है कहाँ
जिंदगी में इन दिनों फुर्सत बड़ी है चल रही
फुरसतों के दौर में अब जर सलामत है कहाँ
ढूंढती है मुंह छिपाने की जगह मजबूरियाँ
हादसों की जद से कोई दर सलामत है कहाँ
ढूंढते हो जिंदगानी मौत के बाजार में
शहर क्या कोई मुहल्ला घर सलामत है कहाँ
आबरू की छोड़िए है जान आफत में पड़ी
गिर पड़े दस्तार सारे सर सलामत हैं कहाँ
इस तरक्की वास्ते क्या क्या चुकाए मोल हैं
गांव छूटा खेत छूटे घर सलामत है कहाँ
कुछ शिकस्ता मन दरीदा जिस्म मायूस हसरतें
लौट तो आए हैं लेकिन दर सलामत है कहाँ
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