ये दर्दे मुहब्बत के मानी न पुछो
यूँ बर्बादियों की कहानी न पुछो
जला अपना घर हमने की रोशनी है
अब हमसे पसे तर्जुमानी न पुछो
गुजर हो रही सिसकियों दरमियाँ ही
है कहते किसे शादमानी न पुछो
उजालों की राहें है तकता बिचारा
उदासी अंधेरों जुबानी न पुछो
शिकायत अदावत मजम्मत बड़ी है
कदम दर कदम की निशानी न पुछो
मिले दर्द आंसू ही बस जिंदगी में
है भरपूर आफात हानि न पुछो
वहीं बेहिसी है कहाँ है नया कुछ
पलायन प्रथा है पुरानी न पुछो
न झकझोर पाए ये सोते बशर को
कलम में लहू है कि पानी न पुछो
है जद्दोजहद कश्मकश से भरी ये
अब हमसे खबर जिंदगानी न पुछो
खिले फूल हर रंग गुलशन में देखो
अब हमसे हरा जाफरानी न पुछो
हर इक कौम के लोग रहते यहां हैं
यूँ हमसे लहू की निशानी न पुछो
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