Friday, 15 May 2020

ये दर्दे मुहब्बत के मानी न पुछो

ये  दर्दे  मुहब्बत  के   मानी  न पुछो
यूँ  बर्बादियों  की   कहानी   न पुछो

जला अपना घर हमने की रोशनी है
अब  हमसे   पसे तर्जुमानी  न पुछो

गुजर हो रही सिसकियों दरमियाँ ही
है  कहते  किसे  शादमानी  न  पुछो

उजालों  की राहें  है  तकता बिचारा
उदासी   अंधेरों   जुबानी   न   पुछो

शिकायत अदावत  मजम्मत बड़ी है
कदम दर कदम की निशानी न पुछो 

मिले दर्द  आंसू  ही  बस  जिंदगी में 
है  भरपूर  आफात   हानि  न  पुछो

वहीं  बेहिसी  है   कहाँ  है नया कुछ
पलायन  प्रथा   है   पुरानी  न  पुछो 
 
न  झकझोर  पाए  ये सोते बशर को 
कलम  में  लहू  है  कि पानी न पुछो

है  जद्दोजहद  कश्मकश  से भरी  ये
अब  हमसे  खबर जिंदगानी न पुछो

खिले फूल  हर रंग  गुलशन में देखो
अब  हमसे  हरा  जाफरानी  न पुछो

हर इक कौम  के लोग  रहते यहां हैं
यूँ  हमसे  लहू की  निशानी  न पुछो

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