कर लो फिर से आयोजित कुछ शोक सभाएं
भेंट चढ़ी फिर नियति के कुछ विपदाएं
मातम पसरा चीख रही है मजबूरी
किस पर दोष मढ़े सोच ये मन मिचलाए
विचलित है मन से व्यथित हैं जन मानस
पर आक्रोश न उपजे देख ये घटनाएं
मुंह ताकते पड़ी रोटियाँ बिखरी सब
जिनकी खातिर उसने तन अपने कटवाए
इंतजार ही करते रह गये सब मुसाफिर
मौत बनी रेल उन्हें रौंदती निकली फिर हाए
क्या करे मजदूर थे जाहिल बिचारे
गांव जो अपना छोडकर परदेश आए
भूख ने मजबूर उनको कर दिया जो
आज के हालात ऐसे बन है आए
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