Friday, 15 May 2020

दौरे हाल देख कर सिहर गया है आदमी

दौरे  हाल   देख कर   सिहर  गया  है  आदमी
हादसे  कदम  कदम  पे   डर  गया है  आदमी

पी  गया है  बेचकर  अनाज  घर के  आज वो
नीचता  की  हद  तलक  उतर गया है  आदमी

बेहिसी  गली गली  हैं  शहर  शहर  इस  कदर
बेचकर   जमीर  अपने   मर  गया  है  आदमी

बस  तलाशता  है  मौके  कर गुजरने  को नया
कौन  कह रहा  कि अब  सुधर गया है आदमी

हौसले  न   पस्त  है   अभी  थका   नही  जरा
बस  जरा  सी  देर  को  ठहर  गया है  आदमी

गल्तियों से  तौबा  कर रहा  हमल में था मियां 
अपनी  बात  से  मगर  मुकर  गया है  आदमी

हर कदम पे  धोखे  और  हर कदम पे  चोट है
दर्द  और   दर्द  से  ही   भर  गया  है  आदमी

आपदा में  भी  कहाँ  है  बाज  आ  रहा  कोई
कारनामें  फिर  नया  सा  कर गया है  आदमी

भाषणों  से  राशनों  की  कर   रहा है  पूर्तियाँ
लेख  जोख  में  सदा  सिफर  गया  है आदमी

वक्त के  बदलते  ही  बदल  गये  सब आशना
अपनो में बन अजनबी  बिखर गया है आदमी

शोर  है  जरूरतों  के  चाहतों  की   कश्मकश
इस  उधेड बुन  में अब किधर गया है आदमी

मंदिरों  में   मस्जिदों  में   ताले  है   लटक रहे
रब से मिलने  मयकशी के घर गया है आदमी

आने फिर लगे रूझान मयकदा जो खुल गया
मुद्दतों  के  बाद  फिर  से  तर  गया है आदमी

No comments:

Post a Comment