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वो भुखे को रोटी का किस्सा कहाँ है
तसल्ली भरोसा नया सा कहाँ है
ये बांटे हैं तुमने जो राहत के पैकेज
जरा इनमे कह मेरा हिस्सा कहाँ है
कहाँ है कुछ उम्मीद की कोई किरणें
कहीं मेरे बारे में चर्चा कहाँ है
तेरी फिक्र में हुक्मरां कुछ बता तो
मेरे जैसा मध्यम सा तबका कहाँ है
सवर्णों का तमगा लिए फिर रहा मैं
किसी के लिए पर ये मसला कहाँ है
कहीं छूट कर में कहीं सब्सिडी है
मगर मेरे खातिर भी सोचा कहाँ है
मेरे घर भी चूल्हा जला कब नही है
किसी ने भी आकर के देखा कहाँ है
हर इक वर्ग की फिक्र की आपने पर
मेरी की हो परवाह ऐसा कहाँ है
वो बनिया है ब्राम्हण है ठाकुर हैं सिंधी
नजर में किसी के भी पिछड़ा कहाँ है
सभी की तरह है मेरी भी कहानी
किसी से अलग मेरा दुखड़ा कहाँ है
मेरी भी हो सकती है मजबूरियाँ कुछ
कोई भी मगर ये समझता कहाँ है
हमेशा बड़ा आदमी बस बताया
कभी खोखला घर टटोला कहाँ है
मेरी भी रही खाशियत ये सदा से
बड़ी मुश्किलों में जी रोया कहाँ है
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