Friday, 15 May 2020

वो भुखे की रोटी का किस्सा कहाँ है

122 122 122 122 
वो  भुखे  को  रोटी का  किस्सा कहाँ है 
तसल्ली    भरोसा    नया  सा   कहाँ है

ये  बांटे हैं  तुमने  जो   राहत के पैकेज
जरा  इनमे  कह   मेरा  हिस्सा  कहाँ है

कहाँ  है  कुछ उम्मीद  की कोई किरणें
कहीं     मेरे   बारे  में     चर्चा   कहाँ है

तेरी   फिक्र  में  हुक्मरां  कुछ  बता तो
मेरे  जैसा  मध्यम  सा  तबका  कहाँ है

सवर्णों  का  तमगा  लिए  फिर  रहा मैं
किसी  के लिए  पर  ये  मसला कहाँ है

कहीं   छूट   कर  में   कहीं सब्सिडी है
मगर   मेरे   खातिर  भी  सोचा कहाँ है

मेरे   घर  भी  चूल्हा  जला कब नही है
किसी  ने भी  आकर के  देखा  कहाँ है

हर इक  वर्ग  की  फिक्र की आपने पर
मेरी   की  हो  परवाह   ऐसा   कहाँ  है

वो बनिया है ब्राम्हण है ठाकुर हैं सिंधी
नजर में  किसी के भी  पिछड़ा कहाँ है

सभी  की  तरह  है   मेरी  भी   कहानी
किसी  से  अलग  मेरा  दुखड़ा कहाँ है

मेरी भी  हो सकती है  मजबूरियाँ कुछ
कोई  भी   मगर  ये   समझता  कहाँ है

हमेशा   बड़ा   आदमी    बस   बताया
कभी   खोखला   घर   टटोला  कहाँ है

मेरी   भी   रही   खाशियत  ये  सदा से
बड़ी  मुश्किलों  में   जी   रोया  कहाँ है

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