दरमियाँ क्यूँ फकत फासला रह गया
क्या रहा रब्त कल आज क्या रह गया
अब वो लम्हें हंसी सब कहाँ गुम हुए
हर कदम हादसा हादसा रह गया
ख्वाब में भी मुझे देखता वो नही
जिसको ता उम्र मै देखता रह गया
इक नमी सी है दीवारों में अब तलक
रात भर कौन रोता भला रह गया
दर्द अपना किसे हम सुनाते भला
साथ हमारे फकत आईना रह गया
ख्वाहिशों हसरतों की गुथी गांठ सी
हर मजा मौज सारा धरा रह गया
जिंदगी बोनसाई के जैसी लगी
जो भी देखा वो बस देखता रह गया
दिल की दहलीज़ पे जब चरागां किया
जल गये तेल बाती दिया रह गया
फिक्र मंजिल की थी ना सफर कोई था
वो भी क्या दिन रहे आज क्या रह गया
कुछ न सुनता कोई कुछ न कहता कोई
शहर ये गूंगे बहरों ही का रह गया
दर ब दर ढूंढते हम जमीं आसमां
पर न जाने कहाँ वो खुदा रह गया
खुश हैं हम देख वीरां सा दैरो हरम
आज मुझसा ही तन्हा खुदा रह गया
देख कर चार कांधे कहा मुर्दे ने
जीते जी लापता क्यूँ भला रह गया
जो सबक कल किताबों में हमने पढ़ा
वो असल जिंदगी में धरा रह गया
लूटने वाले अपने ही है मुल्क में
गैर का ख्वाब बस ख्वाब सा रह गया
मौत सिरहाने रख सो रहे हैं सभी
जिंदगी का यही फलसफा रह गया
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