Friday, 15 May 2020

दरमियाँ क्यूँ फकत फासला रह गया

दरमियाँ  क्यूँ  फकत  फासला  रह गया
क्या  रहा  रब्त कल आज क्या रह गया

अब  वो लम्हें   हंसी  सब  कहाँ गुम हुए
हर  कदम    हादसा    हादसा  रह  गया

ख्वाब   में  भी   मुझे   देखता   वो  नही
जिसको   ता उम्र   मै   देखता  रह  गया

इक  नमी सी  है  दीवारों  में  अब तलक
रात भर   कौन   रोता   भला   रह  गया

दर्द  अपना   किसे  हम   सुनाते    भला 
साथ  हमारे   फकत   आईना  रह  गया

ख्वाहिशों  हसरतों  की   गुथी  गांठ  सी
हर  मजा   मौज  सारा   धरा   रह  गया

जिंदगी    बोनसाई    के    जैसी    लगी
जो  भी  देखा  वो  बस  देखता रह गया

दिल की  दहलीज़ पे  जब चरागां किया
जल  गये   तेल  बाती   दिया  रह  गया

फिक्र मंजिल की थी ना  सफर कोई था
वो भी क्या दिन रहे आज क्या रह गया

कुछ न सुनता कोई कुछ न कहता कोई
शहर  ये  गूंगे  बहरों  ही  का  रह  गया

दर ब दर   ढूंढते   हम   जमीं   आसमां 
पर  न  जाने  कहाँ  वो  खुदा  रह  गया

खुश  हैं  हम  देख  वीरां  सा  दैरो हरम
आज  मुझसा  ही  तन्हा  खुदा रह गया

देख कर    चार   कांधे    कहा   मुर्दे  ने
जीते  जी  लापता  क्यूँ  भला  रह गया

जो  सबक  कल किताबों में हमने पढ़ा
वो  असल  जिंदगी  में   धरा  रह  गया

लूटने  वाले   अपने  ही   है   मुल्क  में
गैर का  ख्वाब  बस ख्वाब सा रह गया

मौत  सिरहाने   रख  सो  रहे  हैं  सभी
जिंदगी  का  यही  फलसफा  रह गया

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