Saturday, 30 July 2016

पेट भरे हो तो ही ये मजहब नजर आते हैं

पेट भरे हो तो ही ये मजहब नजर आते हैं
भुखे को मंदिर मस्जिद कब नजर आते हैं

जिंदगी में भुख ये कितने तमाशे करती है
चौराहे नौनिहाल के करतब नजर आते हैं

मुफलिस झोपड़ी में खिड़कियाँ नही होती
सुराखों के दरमियां ही  सब नजर आते हैं

टखने छाती से चिपका सो जाता है बेचारा
मांस नही जिस्म में हाड अब नजर आते हैं

आंसू उबालती है मां फिर खाली पतीले में
बच्चे भुख से बिलखते  जब नजर आते हैं

हुकूमतें अक्सर ही  वादे खिलाती आयी है
खोखले वादों में भुखे साहब नजर आते है

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा
नही मिलती कोई खबर वारदात के सिवा

मशरुफियत सी दिखी  हर शख्स में यहां
मिलता है गर्मजोशी से  जज्बात के सिवा

उठाकर जो देखी तस्वीरें  बीते सालों की
ठहरा हुआ वक्त मिला  लमहात के सिवा

आजमाईश हौसलों की करती है जिंदगी
वजूद रह गया  फकत  औकात के सिवा

कहकहों में कितनी सिसकियाँ दबी सी है
शोर बहुत है शहर में   सवालात के सिवा

तेरा ख्याल तेरी ही तलब  तेरी ही आरजू
सब मिला तेरे इश्क में मुलाकात के सिवा

रंग हुस्न गहने जलवे सब थे महफिल में
कमी न थी कोई वहां  हंसी रात के सिवा

देखे है शहर के भीतर बेशुमार है आदमी
वहां कोई भी तन्हा न था   जात के सिवा

दरो दीवार ढुंढ लिया शामों सहर के सिवा

दरो दीवार ढुंढ लिया शामों सहर के सिवा
नही मिला सुकून कहीं उसके दर के सिवा

खानाबदोश जिंदगी  राहों पे  हो रही बसर
हुआ क्या  हासिले हयात  सफर  के सिवा

कल रात दफ्फतन ही हमे वो बेरिदा मिला
दीद मुकम्मल न हुई पर भी नजर के सिवा

रुकी-रुकी सी लग रही नब्ज-ए-हयात क्यूँ
ये कौन उठा  सिरहाने से  बिस्तर के सिवा

जुस्तजू में जिसकी रहे  दर बदर  ताहयात
कहीं भी  न मिला  हमे वो  जिगर के सिवा

भुख की कीमत जो जिस्म बेचकर आयी है
कुछ भी उसमें बाकी कहां  पत्थर के सिवा

दीवानावार है जिंदगी  फिरती है यहाँ वहाँ
अजिय्यत मसाइल दर्द सब है घर के सिवा

Thursday, 28 July 2016

जब मिले बस वही बेकार की बातें

जब मिले बस वही बेकार की बाते
बेसबब बेफिजूल तकरार की बाते

अब नही होती चर्चा अम्न चैन की
अरसे से  सुनी नही  प्यार की बाते

फिजायें भी बेरंग सी लगने लगी हैं
अब नही होती है गुलजार की बाते

उस बस्ती मे चुल्हे अवकाश पर है
कैसे हो वहां कोई त्योहार की बाते

फुटपाथ पे यूँही बसर होती है अब
सुनते थे हम कभी घरबार की बाते

बदलती है शख्सियतें सुब्ह शाम में
कैसे करे कोई भी किरदार की बाते

हुकुमतें  तो फकत वादे खिलाती है
खोखली है सभी   सरकार की बाते

रसुखदारो की महज चलती है यहां
सुनी नही जाती है  लाचार की बाते

रवायतें उम्र भर यूँ भी निभाना पड़ता है

रवायतें  उम्र भर  यूँ  भी निभाना  पड़ता है
हादसों को भी अक्सर भुल जाना पड़ता है

हंसी सब  छिन ली है  वक्त की  खरासो ने
दबाकर सिसकियों को मुस्कुराना पडता है

नवाबी  भूली बिसरी  बातें बन कर रह गई
पेट की खातिर ये  जिस्म गलाना पड़ता है

कितने अरमानों को  सीने में छुपा  रखे थे
जरुरतों की खातिर उन्हें भुलाना पड़ता है

जुस्तजू में तेरी   दर बदर   खुद को किया
तेरे घर होकर ही मेरा आशियाना पड़ता है

टूटी सी पगडंडी देख चंद यादें हरी हो गई
यूँ ही पगडंडी से मेरा गांव पुराना पड़ता है

मसाइल जीस्त में बेवक्त ही आती रहती है
भुला सब मुश्किलें खिलखिलाना पड़ता है

वो बेबाकी से मुस्कुरा लेता है बच्चा है न

वो बेबाकी से मुस्कुरा लेता है बच्चा है न
किसी कांधे सर टिका लेता है बच्चा है न

नही रखता कोई हादसा  दिल में वो दबा
आसानी से दर्द  भुला लेता है बच्चा है न

कोई खरास कोई तल्खी वो जानता नही
सभी को अपना बना लेता है बच्चा है न

हंसता है रोता भी है बेवक्त में सोता भी है
वो वक्त से  लम्हे चुरा लेता है बच्चा है न

खुद से खेलता है खुद को ही खिलाता है
दिल को यूँ भी बहला लेता है बच्चा है न

आशनाई है किधर  भांप लेता है अक्सर
रिश्ते पल में आजमा लेता है  बच्चा है

Wednesday, 27 July 2016

सारी शिकायतें ले आ हिसाब जोड़ के

सारी शिकायतें ले आ   हिसाब जोड़ के
अपने सितम भी तो ला जनाब जोड़ के

भुले बिसरे सारे लम्हो को ला बटोर कर
सारे मसाइल रख फिर तू सराब जोड़ के

शफक बारिश बादलों से भी पुरी न हुई
बनी मुकम्मल धनक आफताब जोड़ के

हर सूं है बेतरतीब बिखरे से तेरे खयाल
रखा है  इक टूटा हुआ महताब जोड़ के

आने नही देती आंखे  इनको सारी रात
नींदे बैठी दहलीज  चंद ख्वाब जोड़ के

उस  टूटे  झोपड़े में  बरसा  है  झुम  के
भेजा ये कैसा मेरे खुदा सिहाब जोड़ के

मसला  नही है  कहीं भी  दैरो हरम  का
सियासत ने  रखा है ये  हुबाब  जोड़ के

Tuesday, 26 July 2016

दर्द की गलियों से होकर आना अच्छा लगता है

दर्द की गलियों से होकर आना अच्छा लगता है
कभी कभी  आंसू भी  बहाना  अच्छा लगता है

बिना दर्द के ये जिंदगी भी बेवजह सी लगती है
बिला वजह भी खुद को सताना अच्छा लगता है

जुबान जो फिसले तो  किरदार नंगे हो जाते हैं
तहज़ीब के ओढो ताना बाना   अच्छा लगता है

करवटों के बीच में तडफती रहती है सारी रात
किसी वजह कभी नींद न आना अच्छा लगता है

खैरातों के दिन है अपने और उधार की है रातें
मुश्किलों का बड़ा सा शामियाना अच्छा लगता है

धुल पैरों से जिस तरह लिपट चिपट सी जाती है
खयालो का तेरे यूँ   कभी आना अच्छा लगता है

अक्सर अपनी ही खुशियां क्यूँ बेघर हो जाती है
तकदीर को क्यूँ  हमे ही सताना अच्छा लगता है

बखूब है वाफिक वो जज्बात से मेरे

बखूब है वाफिक वो   जज्बात से मेरे
रहता डरा डरा सा है सवालात से मेरे

मसाइल जीस्त में तो है कोई कम नही
देता है औ जियादा वो औकात से मेरे

गिर के  वक्त से  कहीं  लम्हा  खो गया
हादसा ये जुदा नही  मुश्किलात से मेरे

इक खयाल एक तलब एक ही आरजू
वाक़िफ़ है ये शहर भी मामलात से मेरे

कोई शिकवा कोई गम कोई गिला नही
आशना है खुब ये आंसू भी जात से मेरे

मुआफिक मेरे एक दिन जी के देख ले
हो रुबरु  कभी तो तू भी हालात से मेरे

किरदार  यूँ हर घडी  बदला न किजिये
बची न शख्सियत तेरी निशानात से मेरे

रिश्तों का भरम ये पालना नही अच्छा

रिश्तों का भरम ये पालना नही अच्छा
अपने सिवा कोई   अपना नही अच्छा

दे दे कर दर्द वो पुछते है हाल कैसा है
ऐसे आशनाई से  आशना नही अच्छा

कोई शिकवा कोई गम कोई याद नही
बेवजह में बैठे बैठे    रोना नही अच्छा

कहकशों के दरमियां है दब सी गई वो
सिसकियों के साथ चलना नही अच्छा

बेमतलब की बात से  खामोशी बेहतर
बेवक्त बेलिहाज से बोलना नही अच्छा

दिल से मुलाकात हो  जिससे भी मिलें
रुखे से जज्बात से मिलना नही अच्छा

वक्त से किरदार  न बदले  वही बेहतर
पुराना कोई राब्ता  भुलना नही अच्छा

Saturday, 16 July 2016

नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं

नाराज अपने आप से खुद से खफा हूँ मैं
रिश्तों के दरमियां हूँ पर सबसे जुदा हूँ मैं

ये जिस्मो खाक से कोई खुद को संवार ले
इतना न   अपने आप में  भी    बचा हूँ मैं

मत दो मुझे खैरात में उजाले जरा से तुम
जुगनुओं से न मिटेंगे ये अंधेरा घना हूँ मैं

गुम है शहर से आजकल सुकूं अम्नो चैन
दहशतगर्दी का आलम है सोता कहां हूँ मैं

अंगड़ाई जुल्फ आईना ख्वाब चांद गुलाब
मुफलिसी से टूटके सब ये भुल गया हूँ मैं

इबादत जियारत  सजदा मन्नत बेमानी है
उलझी हुई सी   जिंदगी उलझा हुआ हूँ मैं

Monday, 4 July 2016

मिजाज जिंदगी से खफा होने नही देता

मिजाज जिंदगी से खफा   होने नही देता
हालात भी रिश्तों से वफा होने नही  देता

रहता है इक और शख्स मुझमें मेरे सिवा
जो मुझे कभी तुझसे जुदा होने नही देता

अक्सर तब जीत कर भी मै हार जाता हूँ
खुद हार जो वो मुझे फना होने नही देता

न इशारा  न दिलासा  न कोई वादा मगर
इंतजार तेरा हमको शफा  होने नही देता

इत्मिनान सुकून  कहां  सबके हक आते
नसीब अपना हमें इनका  होने नही देता

बारिश से भी न बुझी तडप इस दिल की
फिर भी ये  हमें रूआसा  होने नही देता

अल्फाज़ सारे खामोश अशआर बेअसर
क्यूँ कोई भी मेरा दर्द अता होने नही देता

Friday, 1 July 2016

अपने किरदार का भी कुछ तो पता रहने दे

अपने किरदार का भी कुछ तो पता रहने दे
जरा सा दाग है    दामन में तो लगा रहने दें

वही जिद वही जरुरते औ हसरतें बेलगाम
अजीब है फलसफा     जिंदगी का रहने दे

खुब तमाशा दिलजलो का उखडी है सांसे
कायम है अभी  उम्मीद का दिया   रहने दे

ये रिश्ते महज उलझने    बढाते है दिल के
रह गया है तुझमे बाकी   कहकहा रहने दे

चले जायेंगे महफिल से रुसवा किये बिना
यूँ बेआबरू करके   तु    न   उठा  रहने दे

पसीने से तर जिस्म खूंटी से टांग देता रोज
मेरी दहलीज से न पुछ तु मेरा पता रहने दे

जंजीरे हो तो कोई  बांध दो खयालात मेरे
कैसे बेलिबास आरजूओ को खुला रहने दे