Saturday, 30 July 2016

दरो दीवार ढुंढ लिया शामों सहर के सिवा

दरो दीवार ढुंढ लिया शामों सहर के सिवा
नही मिला सुकून कहीं उसके दर के सिवा

खानाबदोश जिंदगी  राहों पे  हो रही बसर
हुआ क्या  हासिले हयात  सफर  के सिवा

कल रात दफ्फतन ही हमे वो बेरिदा मिला
दीद मुकम्मल न हुई पर भी नजर के सिवा

रुकी-रुकी सी लग रही नब्ज-ए-हयात क्यूँ
ये कौन उठा  सिरहाने से  बिस्तर के सिवा

जुस्तजू में जिसकी रहे  दर बदर  ताहयात
कहीं भी  न मिला  हमे वो  जिगर के सिवा

भुख की कीमत जो जिस्म बेचकर आयी है
कुछ भी उसमें बाकी कहां  पत्थर के सिवा

दीवानावार है जिंदगी  फिरती है यहाँ वहाँ
अजिय्यत मसाइल दर्द सब है घर के सिवा

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