दरो दीवार ढुंढ लिया शामों सहर के सिवा
नही मिला सुकून कहीं उसके दर के सिवा
खानाबदोश जिंदगी राहों पे हो रही बसर
हुआ क्या हासिले हयात सफर के सिवा
कल रात दफ्फतन ही हमे वो बेरिदा मिला
दीद मुकम्मल न हुई पर भी नजर के सिवा
रुकी-रुकी सी लग रही नब्ज-ए-हयात क्यूँ
ये कौन उठा सिरहाने से बिस्तर के सिवा
जुस्तजू में जिसकी रहे दर बदर ताहयात
कहीं भी न मिला हमे वो जिगर के सिवा
भुख की कीमत जो जिस्म बेचकर आयी है
कुछ भी उसमें बाकी कहां पत्थर के सिवा
दीवानावार है जिंदगी फिरती है यहाँ वहाँ
अजिय्यत मसाइल दर्द सब है घर के सिवा
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