बखूब है वाफिक वो जज्बात से मेरे
रहता डरा डरा सा है सवालात से मेरे
मसाइल जीस्त में तो है कोई कम नही
देता है औ जियादा वो औकात से मेरे
गिर के वक्त से कहीं लम्हा खो गया
हादसा ये जुदा नही मुश्किलात से मेरे
इक खयाल एक तलब एक ही आरजू
वाक़िफ़ है ये शहर भी मामलात से मेरे
कोई शिकवा कोई गम कोई गिला नही
आशना है खुब ये आंसू भी जात से मेरे
मुआफिक मेरे एक दिन जी के देख ले
हो रुबरु कभी तो तू भी हालात से मेरे
किरदार यूँ हर घडी बदला न किजिये
बची न शख्सियत तेरी निशानात से मेरे
No comments:
Post a Comment