Saturday, 30 July 2016

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा
नही मिलती कोई खबर वारदात के सिवा

मशरुफियत सी दिखी  हर शख्स में यहां
मिलता है गर्मजोशी से  जज्बात के सिवा

उठाकर जो देखी तस्वीरें  बीते सालों की
ठहरा हुआ वक्त मिला  लमहात के सिवा

आजमाईश हौसलों की करती है जिंदगी
वजूद रह गया  फकत  औकात के सिवा

कहकहों में कितनी सिसकियाँ दबी सी है
शोर बहुत है शहर में   सवालात के सिवा

तेरा ख्याल तेरी ही तलब  तेरी ही आरजू
सब मिला तेरे इश्क में मुलाकात के सिवा

रंग हुस्न गहने जलवे सब थे महफिल में
कमी न थी कोई वहां  हंसी रात के सिवा

देखे है शहर के भीतर बेशुमार है आदमी
वहां कोई भी तन्हा न था   जात के सिवा

No comments:

Post a Comment